मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम

‘मेरे जीवन का सबसे बड़ा काम’ – हरिवंशराय बच्चन

(कविता संग्रह ‘दो चट्टानें’ से)

बंद कर अलार्म,
अपने डबल बेड में, खाँस करके,
‘वा गुरू की फ़तह’, ‘जय सियाराम’ कहकर,
हम मियाँ-बीवी गए हैं बैठ उठकर।
और चा’ के लिए राधेश्याम को आवाज़ देकर,
एक लम्बी जँभाई ले,
इस तरह कहने लगा हूँ मैं:
‘तेज, मैंने रात को यह स्वप्न देखा है
कि जैसे मर गया हूँ।’
‘सुबह होते ही चलाते बात कैसी!
मुझे अच्छी नहीं लगती।’
‘सुनोगी भी, बड़े लोगों ने कही है,
स्वप्न मरने का दिखाई दे अगर
तो उम्र बढ़ती।’
‘तो सुनाएँ, क्या हुआ फिर?’

‘फिर हुआ यह
बहुत-से घन बनों,
ऊँचे पर्वतों को पार करता
स्वर्ग पहुँचा-
स्वर्ग था संसार ही-सा-
पास ही में कर्म-लेखालय बना था,
ले गया कोई वहाँ पर
फ़ाइलों की थीं लगी ऐसी क़तारें
आदि उनका, अंत उनका था न मिलता।
क्लर्क भी थे, पर अँगरखे
पगड़ियाँ धारण किए थे।
मुख्य पद पर
चित्रगुप्त
मुकुट, सुनहले वस्त्र पहने
क़लम ले बैठे हुए थे,
और जो भी आ रहा था सामने
यह कह रहा था-

यमाय धर्मराजाय
चित्रगुप्ताय वै नमः!

और मुझको देखकर
पूछा उन्होंने,
‘प्राप्त कर चोला मनुज का
काम सबसे बड़ा तुमने
क्या किया है?’
कभी तो मैं सोचता
कह दूँ कि ‘मधुशाला’ लिखी है,
कभी उनके दूत का रुख देखकर मैं सोचता
कह दूँ कि ‘जनगीता’ बनाई..
और भी बातें बहुत-सी उठीं मन में,
प्यार की, संवेदना की,
और यत्किंचित किए उपकार की भी,
किन्तु मैंने अंत में
जो कुछ कहा वह अजब ही था-

‘एक पति-पत्नी बहुत दिन से अलग थे;
एक उनको किया मैंने।’
चित्रगुप्त प्रसन्न होकर मुस्कराए
और बोले,
‘अभी जाओ,
और भी उनको मिलाओ,
मेल उनमें और भी पक्का कराओ।’
बज उठा अलार्म इस पर- खुली आँखें-
स्वप्न का मतलब बताओ!’

■■■

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Harivanshrai Bachchan - Do Chattanein

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This Post Has One Comment

  1. वाह, यह कविता मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी थी। धन्यवाद आपका।

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