‘मेरी हस्ती मेरा नील कमल’ – परवीन ताहिर

मेरे ख़्वाब जज़ीरे के अंदर
इक झील थी निथरे पानी की
इस झील किनारे पर सुंदर
इक नील कमल जो खिलता था
इस नील कमल के पहलू में
इक जुगनू जगमग जलता था
दो-चार दिनों से फूल कमल
अब ज़रदी माइल लगता है
और जुगनू ख़्वाब जज़ीरे का
कुछ सहमा-सहमा लगता है
मेरी हस्ती मेरा नील कमल
और जुगनू जोत है सीने की
मेरा ख़्वाब रहे तो मैं भी हूँ
मेरी जोत जले तो मैं भी हूँ
वर्ना क्या लेना देना है
इस ख़ालम ख़ाली दुनिया से!!

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)