‘मेरी जेल डायरी’ से एक कविता

जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से
तो क्या वह मूर्खता थी?
नहीं।
सफलता और विफलता की परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी
इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य पथ ही मान्य उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के
जग जिसे कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें
मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को
तो विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जाए..