ख्यालों को बहने दो

ख्यालों को बहने दो,
बनके नदिया,
किसी प्यासे तक पहुंचेंगे
उड़ने दो,
बनके चिड़िया आसमानों में
किसी सुनसान कानो में
जा के चहकेंगे..

गाँव को देखा

हमने तुमने
गाँव को देखा

सूखे रास्ते देखे
सूखे जलकुंड
सूखे पेड़ों के कांटे देखे
कभी न बहने वाली नदी
कभी न बनने वाली नांव को देखा
हमने तुमने
गाँव को देखा,

दोपहर के सन्नाटे को चीरती
खाली पेट से भरे
कितने बच्चों की खिलखिलाहट देखी
सूखी ज़मीं, खाली आसमाँ को देखा,
हमने तुमने
गाँव को देखा,

हवाओं के सैकड़ों थपेड़े देखे
उड़ते हुए मकां
तैरते हुए घर देखे
कपकपाते हुए हाथ
लड़खड़ाते हुए पाँव को देखा
हमने तुमने
गाँव को देखा

आंखों में एक उम्र देखी
आस देखी, प्यास देखी
बीहड़ो के राज़ देखे
काँटों की पत्तियां, काँटों के फूल
काँटों की छांव को देखा
हमने तुमने
गाँव को देखा!

पंछी

काश दो पंख मेरे भी होते,
जिनको फैला कर मैं
मापता आसमाँ, ताकता ज़मीं
दुनिया का सफर करता
सरहदों की हदें इधर उधर करता
फिरता जहां तहां लापता कहीं
फिर एक दिन
ग़ुम हो जाता कहीं,
कहाँ? पता नहीं !

मिलन

मैं मिलूंगा तुमसे
ठीक बिल्कुल वैसे ही
जैसे एक लंबे अरसे के इतंज़ार के बाद
चातक बरखा से मिलता है..
तुम भी मिलना वैसे ही
जैसे एक लंबा रास्ता तय करने के बाद
नदी समंदर से मिल जाती है..
हम मिलेंगें
जब समय होगा
स्वाति नक्षत्र का
जहां रास्ता ख़त्म हो जाएगा
हम मिलेंगे
जब बरखा चातक से मिल पाएगी
जब समंदर नदिया को अपने में समा लेगा

मिलने का समय
निश्चित होता है
निश्चित ही हम मिलेंगे !

गाँव और शहर

अपने अदंर मैं,
शहर और गाँव दोनों
लिए फिरता हूँ,
जिस दिन उदास लगूं
तो शहर समझना मुझे
जिस दिन ख़ुश दिखाई दूँ,
समझना ये गाँव है!