किताब: ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ — अशोक कुमार पांडेय
टिप्पणी: नरेंद्र सहरावत

बुद्ध के बारे में एक दंतकथा है कि बुद्ध ने एक सभा में सुबह सामने बैठे लोगों से कहा कि वे शाम को ज़रूर आएँ—बुद्ध उन्हें कुछ कहना चाहते हैं। शाम को लोग आए; बुद्ध अपने शिष्य आनंद के साथ मंच पर आए और ध्यान में बैठ गए। कुछ समय बाद उन्होंने आँखें खोलीं और फिर उठकर चले पड़े। लोगों ने कहा कि आपने कहा था कि कुछ कहना है आपको? तो उन्होंने कहा कि हाँ, मैंने आनंद को बोल दिया है, अब आनंद आपको बता देगा। लोगों ने आनंद से पूछा तो आनंद ने कहा कि यह बात इतनी आसान नहीं है और जब ख़ुद बुद्ध ने बात नहीं कही तो मैं क्यों इस बखेड़े में पड़ूँ। उसके बाद वो बात जो बुद्ध ने आनंद को मौन में बतायी, यूँ ही आगे बढ़ती रही। तक़रीबन ग्यारह सौ साल बाद चीन में एक दिन बोधि धम्म ने कहा कि जो बात बुद्ध ने आनंद को मौन में बतायी थी, उस बात को आज मौन में सुनने वाला कोई भी नहीं बचा इसलिए अब मैं उसे शब्दों से कहता हूँ और जो भी बोधि धम्म ने कहा, वे बुद्ध के वचन ही माने गए।

ऐसा नहीं है कि गांधी की हत्या पर पहले किताबें नहीं लिखी गईं, बहुत लिखी गईं और अच्छी भी लिखी गई हैं लेकिन फिर भी वे चर्चा का विषय नहीं रहीं। कारण सिर्फ़ इतना भर है कि जब गांधी की हत्या हुई तो दो बातें घटीं। एक कि इस हत्या को न केवल भारत में ही बल्कि पूरे विश्व में निंदा मिली। दूसरा, गांधी हत्या के विचार में जितने भी लोग या दल शामिल थे, उनमें से हिंदू महासभा को छोड़ या तो उन्होंने फ़ौरी तौर पर मौन धारण कर लिया या इस हत्या से अपना पल्ला झाड़ लिया। गांधी हत्या से पूरे भारत में एक इतना गहरा मौन घटा जिसने यहाँ बसने वाले लोगों की मानसिक चूलें हिला दीं। इतने गहरे मौन में इस सवाल को कि यह कृत्य सही था या ग़लत—अपना जवाब ढूँढने कहीं नहीं जाना पड़ा। नैसर्गिक रूप से इस कृत्य को घिनौना माना गया इसलिए इस विषय पर लिखी गई किताबें चर्चा का विषय नहीं बनीं।

इसके बाद हम समय की पगडंडी पर आगे बढ़े। गांधी हत्या पर जिन लोगों ने फ़ौरी तौर पर जो ख़ामोशी की धुंध ओढ़ ली थी, वो धुंध अब छँटने लगी। इस हत्या में शामिल दलों ने रफ़्ता-रफ़्ता गांधी और गांधी के विचारों पर अपने इल्ज़ाम लगाने शुरू किए। समय के साथ जो लोग गांधी के सम्पर्क में रहे थे या उनके विचारों के अनुयायी थे, वे मौत की नाव में बैठ दुनिया को छोड़ते चले गए और उनकी जगह नई यथार्थवादी पीढ़ियों ने ली। पिछले साढ़े तीन दशक में नई पीढ़ी के सामने गांधी का चरित्र हनन किया गया। उन पर व्यक्तिगत आरोप लगाए गए। जो लोग बँटवारे के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार थे, उन्होंने उल्टा गांधी को इस बँटवारे का ज़िम्मेदार ठहरा दिया। नई पीढ़ी ने इन सब आरोपों को बहुत हद तक सही भी मान लिया है इसलिए गांधी की हत्या को सही मान लेने वालों की संख्या आज बहुत है। विपक्ष जितना भी पुख़्ता होगा, शोर उतना ज़्यादा होगा। आज जब इस शोर में एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा है जो गांधी हत्या से पैदा हुए मौन को महसूस कर सके तो शब्दों से वो बात कहनी पड़ेगी।

‘उसने गांधी को क्यों मारा?’ को लिखते हुए ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडे ने वही भूमिका अदा की है जो बोधि धम्म ने बुद्ध की बात को शब्दों में कहते हुए की थी। नई पीढ़ी ने गांधी को समझते हुए एक गहरी भूल की है। नई पीढ़ी गांधी को कोरे सिद्धांतवादी नेता के रूप में देखती है जो कि ग़लत है। केवल सिद्धांत से सफलता सम्भव नहीं है लेकिन सिद्धांत के बिना भी सम्भव नहीं है। अफ़्रीका में जिन सिद्धांतों के प्रयोग से गांधी को सफलता मिली, भारत में उन सिद्धांतों के प्रयोग कहीं ज़्यादा कारगर सिद्ध हुए। नई पीढ़ी आज जिस आज़ादी को भोग रही है, गांधी की सफलता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा! ऐसा नहीं है गांधी का करिश्मा केवल भारत तक सीमित था; दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला और अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग को आप चाहें तो भी गांधी से अलग करके नहीं देख सकते। राही मासूम रज़ा कहते हैं— “इतिहास बड़े काम की चीज़ है लेकिन इतिहास से कुछ भी उठाना बड़े जोखिम और ज़िम्मेदारी का काम है।” मुझे लगता है नई पीढ़ी ने गांधी के बारे में जानने का काम उतनी ज़िम्मेदारी से नहीं किया, जितनी ज़िम्मेदारी से किया जाना चाहिए था। ये किताब न केवल गांधी की हत्या के डायनामिक्स को खोलती है बल्कि आपको उस ज़िम्मेदारी का भी एहसास कराती है।

इंटरनेट के इस युग में किसी ने सोशल मीडिया पर किसी फ़िल्म का एक छोटा-सा अंश डाल दिया। इस क्लिप में गांधी और सावरकर का सम्वाद है जिसमें सावरकर गांधी को जाति व्यवस्था को मिटाने की बात करते हैं। जान पूछकर इस क्लिप के माध्यम से यह भ्रम रचा गया कि देखो सावरकर कितने अच्छे इंसान थे। जाति व्यवस्था के विरोध में तो गांधी भी बोल रहा है लेकिन सावरकर जाति व्यवस्था को इसलिए ख़त्म करना चाहता है ताकि तथाकथित छोटी जातियाँ बड़ी जातियों से अलगाव महसूस न करें और मुसलमानों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ें। और गांधी? गांधी चाहता है अस्पृश्यता को मिटाकर एक समरस समाज का निर्माण किया जाए। अगर मुसलमानों को मारने का काम कहीं और से हो जाए तो सावरकर के लिए जाति व्यवस्था सबसे उत्तम है। ऐसे कितने ही भ्रम हैं जो रूढ़िवादियों ने रचे हैं। मैं अशोक कुमार पांडे को बधाई देता हूँ इस ऐसी शानदार रचना के लिए और धन्यवाद देता हूँ ऐसे बहुत से भ्रमों की कलई खोलने के लिए।

(लेखक परिचय: नरेंद्र सहरावत, प्रवक्ता अंग्रेज़ी, शिक्षा निदेशालय, हरियाणा सरकार। नरेंद्र जी से narendersehrawat.com@gmail.com पर बात की जा सकती है।)
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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