table lamp

“ये जो गद्य के टुकड़े हैं, ये दरअसल मेरी यात्राएँ हैं. मेरी स्टडी में एक दीवार पर दुनिया का नक़्शा लगा हुआ है. मैंने ऐतिहासिक शहरों की तस्वीरें जुटा रखी हैं. मैं छह भाषाओं में किताबें पढ़ता हूँ. पाँच के पहाड़े की तरह मुझे ख़ूबसूरत औरतों का चेहरा याद है. मैंने फिल्मों के व्याकरण में सपने देखे हैं और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुनते हुए, कई रातें उस युग में पहुँच जाने की कोशिश में बिताई हैं, जहाँ संस्कृत और पालि जैसी भाषाएँ आम बोलचाल में इस्तेमाल की जाती थीं. मैं इन सारी बातों को देखता-सोचता-याद करता हूँ, और इस तरह रहता हूँ, मानो हर समय एक यात्रा में रहता होऊँ. गद्य कहलाने वाले ये सारे टुकड़े इसी तरह का देखना-सोचना-याद करना हैं, यही यात्रा है.

पेरू देश के कवि लुईस अर्नान्दीस की एक काव्य-पंक्ति है- “मैंने यात्राएँ नहीं कीं, मैं बस उँगलियों से नक़्शे को छूता रहा.” मेरी यात्रा, अ-यात्रा को मेरा वह परदेसी पुरखा ऐसे बता गया है.”

 

प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

नोट: जानकारी गीत चतुर्वेदी की वॉल से साभार!


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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