निग़ाहों का खेल

ये मतवाली निगाहें
क्या क्या करतब करती हैं
कभी तो ये किसी से
जा मिलती हैं,
तो कभी कहीं छुप जाती हैं
न जाने किसे ढूँढती
किसे खोज़ती हैं
न जाने किसके इंतज़ार में
देहलीज पर बरसों ताकती रहती हैं
न जाने किसी को पल भर
देखने को भी तरसती हैं
कभी शर्माती हैं, कभी इतराती हैं
कभी रोती हैं, कभी हँसने लगती हैं
इनके खेल में बहक ना जाना
ये निगाहें हैं, निगाहें,
नखराली, कजराली निगाहें।