ज्योतिराव फुले की ‘निर्भीकता का एक प्रेरक प्रसंग’

ज्योतिबा निर्भीक थे। साठ वर्ष की अवस्था में भी उनकी निर्भयता में कोई कमी नहीं आई थी। उनकी निर्भीकता का यह प्रसंग प्रेरणास्पद है।

सन् 1889 की बात है। इंगलैंड की रानी विक्टोरिया के पुत्र ड्यूक आव कनाट भारत आए थे। स्थान-स्थान पर उनका स्वागत किया जा रहा था। पुणे में भी उनका स्वागत किया गया।

इस सभा में पुणे के प्रतिष्ठित नागरिक आमंत्रित थे। सभी अच्छी कीमती वेशभूषा में आए थे। महात्मा ज्योतिबा फुले को भी आमंत्रित किया गया था। वे भी आए, लेकिन कुछ विलम्ब से। उनकी वेशभूषा विचित्र थी। शरीर पर फटे वस्त्र, पैरों में फटा जूता। पगड़ी भी फटी हुई। दुपट्टा भी फटा हुआ।

ज्योतिबा एक किसान की वेशभूषा में आए थे। प्रवेश द्वार पर खड़े लोगों ने उन्हें भीतर नहीं जाने दिया। ज्योतिबा ने उन्हें निमंत्रण पत्र भी दिखाया। पर लोग नहीं माने।

इस सभा में ज्योतिबा को श्री हरिराव चिपलूणकर ने निमंत्रित किया था। वे ज्योतिबा के पुराने मित्र थे। पुणे नगरपालिका में दोनों ने एक साथ कार्य किया था। एक साथ कई लड़ाइयाँ भी लड़ी थीं।

प्रवेश द्वार पर शोरगुल सुनकर श्री हरिराव चिपलूणकर बाहर आए। उन्होंने ज्योतिबा को देखा। उनकी वेशभूषा देखकर विस्मित भी हुए। पर कुछ बोले नहीं। वे ज्योतिबा को आदरपूर्वक भीतर ले गए। वहाँ उन्होंने ड्यूक दम्पति से उनका परिचय कराया। बताया, वे बहुत बड़े समाज सुधारक हैं।

इधर ज्योतिबा कुरसी पर न बैठकर धरती पर बिछी दरी पर बैठ गए।

सभा शुरू हुई। सबने ड्यूक की प्रशंसा में भाषण किए।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने भी पाँच मिनट बोलने की अनुमति मांगी। कौन इनकार करता?

महात्मा ज्योतिबा फुले उठे।

चारो ओर सन्नाटा छा गया। लोग उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगे। वे क्या कहते हैं।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने कहा-

“ड्यूक आव कनाट महोदय, आपके स्वागत के लिए यहाँ अच्छी वेशभूषा में आए लोग हिन्दुस्तान के सच्चे प्रतिनिधि नहीं हैं। उन्हें देखकर आप यह अनुमान मत लगाना कि हिन्दुस्तान की परिस्थिति ठीक है। रानी की सारी व्यवस्था अच्छी है। पर यहाँ की प्रजा की अवस्था कैसी हो गई है, यह मेरी वेशभूषा से आपको ज्ञात हो जाएगा। यहाँ मृत्यु पर्यन्त जीने के लिए पेट भर भोजन नहीं मिलता। रहने के लिए जगह नहीं मिलती। लोगों की ऐसी ही दीन-हीन अवस्था हो गई है। रानी से जाकर आप यही कहिएगा।”