निर्जला

वर्ष 2009-10 का समय था, तब मैं कुशीनगर में कार्यरत थी। कुशीनगर मेरे गृह जनपद देवरिया का पुराना हिस्सा पर अब एक स्वतन्त्र जनपद। मैं कुशीनगर जनपद के हाटा नामक तहसील कस्बे में रहती थी। छुट्टियों में, मैं अपने घर जाती थी। तब हाटा से देवरिया को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग पर यातायात का एकमात्र विकल्प था – जीप की सवारी। हमारे उत्तर भारत के पब्लिक ट्रांसपोर्ट अथवा ‘जनता की सवारी’ में बैठो तो बस बिना भूकंप ही ‘भू-दोलन’ का मजा मिलता है। सारा ‘भूत-वर्तमान-भविष्य’ उस सवारी गाड़ी के चालक महोदय पर केंद्रित हो जाता है।

ऐसे ही किसी सप्ताहांत में, मैं जब अपने घर जा रही थी तो मैंने रास्ते में एक युवा ग्रामीण बाला को देखा जो अपनी किसी सम्बन्धी को जीप में बैठाने आई थी; मैं उस बाला को देखती ही रह गई- निर्जला! निर्जला चौधरी। वही नैन-नक्श, वही कद-काठी, पर निर्जला की अपेक्षा उसका वर्ण श्याम था। मैंने स्वयं को आश्वस्त किया कि ये निर्जला नहीं हो सकती। इस दृश्य ने मुझे अपनी उस सहपाठिनी की यादें ताज़ा कर दीं, जिससे मैंने कॉलेज में पहले दिन, पहली बार बात की थी।

घर आने के बाद मैं फिर से निर्जला को याद करने से खुद को नहीं रोक पाई। उसकी स्मृतियाँ पिछले दो वर्षों से मुझे बार-बार सताती थीं। बारहवीं उत्तीर्ण करने के बाद मुझे सहशिक्षा वाले कॉलेज में जाने में एक अजीब प्रकार का भय, संकोच व अनमनापन था। कारण बारहवीं तक की शिक्षा मैंने बालिकाओं के इण्टर कॉलेज से पूर्ण की थी। रही-सही कसर बड़ी बहन की सलाह ने पूरी कर दी, उन्होंने मुझे बताया कि- “कॉलेज में किसी से भी ज्यादा बात मत करना, चूँ-चपड़ करने वाली लड़कियों के नाम दुष्ट लड़के दीवारों पर लिख देते हैं। बहूत हूटिंग करते हैं।”

इस गठरी भर सलाह का असर ये रहा कि कॉलेज में पाँच वर्षों तक, एम.ए. तक मेरा मुँह ‘ज़िप-लॉक मोड’ में रहा। हम मध्यवर्गीय, हमारे लिए तो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है- नाक को ऊँचा रखना हर हाल में, और ये घुट्टी हम सब पिया करते हैं अपने बचपन से ही।

खैर अग्रजों द्वारा कोचे जाने पर मैं अनमनेपन के साथ कॉलेज गई, वहाँ छात्र-छात्राएँ बहुत कम आये थे। गर्ल्स गार्डेन में मुझे अपनी पुरानी जान-पहचान की एक सीनियर लड़की मिल गई। मैंने उनसे पूछा था कि क्या वो बी. ए. प्रथम वर्ष की किसी लड़की को जानती हैं? तब उन्होंने निर्जला की ओर इशारा करते हुए बताया कि ये बी.ए. वन में है, जाओ मिलो उससे। मैं निर्जला की ओर उन्मुख हुई, मैंने उसे ध्यान से देखा- निर्जला करीब पाँच फुट की थी, साफ़ गेहुआँ रंग जिस पर कनेर जैसा पीलापन पुता हुआ था; उसके सीधे-सादे नैन-नक्शों में उसके होठों की बनावट सबसे पहले दृष्टिगत होती थी। उसके होठ थोड़े बड़े थे, जब वो मुस्कुराती तो होंठों का आकार चौरस हो जाता था, जिसके भीतर बराबर दन्त-पंक्ति के ऊपर गुलाबी मसूड़े दिखने लगते थे।

एक-दूसरे का परिचय जानने के बाद हमने एक दूसरे के विषयों के बारे में पूछा तो ये पता चला कि ‘हिन्दी और भूगोल’ हमारे सह विषय थे। इस प्रकार दो कक्षाएँ हम लोग साथ शेयर करने वाले थे। निर्जला ने जीव-विज्ञान से बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की थी; मैं पूछी, “तो फिर बी.एस. सी. में नामांकन क्यों नहीं कराई?” तो बोली, “बी.एस. सी. की फीस ज्यादा है और पढ़ाई कठिन, तो इसके लिए पैसा और समय दोनों ही मेरे पास नहीं हैं।”

उसका उत्तर सुनकर मैं निःशब्द हो गई। इसके बाद कक्षाओं का सिलसिला प्रारम्भ हुआ और कॉलेज के जीवन में हम लोग अभ्यस्त होते चले जा रहे थे।

कुछ दिनों के बाद निर्जला से मैंने उसका पता पूछा था कि वो कहाँ से आती थी? उसने प्रत्युत्तर में जो कुछ भी बताया वो मेरे किशोरवय के अनुभव के हिसाब से अत्यंत संघर्षशील था। निर्जला अपने मामा के घर रहती थी, अपनी छोटी बहन और माँ के साथ। कॉलेज आने के लिए वो मामा के घर से तीन किलोमीटर पैदल चलकर रेलवे स्टेशन आती थी, फिर रेलगाड़ी द्वारा आधे घंटे का सफ़र तय कर हमारे कस्बे आती; फिर हमारे कस्बे के रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर के फासले पर कॉलेज था जहाँ तक फिर वो पैदल ही आती थी।

“तुम तो बहुत मेहनत करती हो।” मैंने जब उससे कहा तो वह बस सीधा-सादा उत्तर दे पाई, “हाँ! अब पढ़ना है तो मेहनत तो करना ही पड़ेगा।”

मैं मन ही मन तुलना करने लगी- हमारे छोटे से कस्बे का छोटा सा कॉलेज, जहाँ श्रेष्ठ शैक्षिक वातावरण था, विद्वान शिक्षकों की पूरी अच्छी-खासी संख्या वहाँ मौजूद थी। कॉलेज परिसर के पीछे ही शिक्षकों का बसेरा भी था; और इसी शिक्षक-कॉलोनी में मेरा परिवार भी रहता था। कॉलेज मेरे लिए घर जैसा ही था तो मोहल्ले वाले ही यहाँ गुरुजन थे। मेरा कॉलेज के प्रति रूखेपन का एक कारण यह भी था- कि ऐसा भी कहीं होता है नौ हाथ की दूरी पर कॉलेज। शायद इस तुलना के बाद मेरे तब की मनः स्थिति में संभवतः कोई अंतर आया हो।

निर्जला से ज्यादा बातचीत करने में, उसके बारे में ज्यादा जानने में यूँ तो मुझे कुछ ख़ास रूचि नहीं थी, पर सहपाठी होने के नाते औपचारिक बातें तो होती ही थीं। एक तो मेरा अंतर्मुखी स्वभाव, ऊपर से मैं आला दर्ज़े की मूडी, तो निर्जला में मेरी अरुचि ओछी तो नहीं थी- हाँ स्वभावगत थी।

हमारी परीक्षाएँ पास आ रही थीं और इन परीक्षाओं की तैयारियों के लिए सबके पास अपने-अपने एजेण्डे थे। इसी बीच मैंने नोटिस किया कि निर्जला के पास किसी विषय की कोई पुस्तक नहीं होती थी। बिना किताबों के पढ़ाई की कल्पना मेरे अनुभव से परे थी, तो मैंने उससे पूछ ही लिया था एक दिन कि- “पढ़ोगी कैसे?”

“क्वेश्चन बैंक ले लेंगे।” उसने उत्तर दिया।

“पास हो जाओगी?” मैंने फिर पूछा तो कहने लगी- “अब लाइब्रेरी से किताबें लेकर के नोट्स बनाई हूँ, टीचर्स के क्लास नोट्स तो हैं ही और क्वेश्चन-बैंक में पास होने भर की सामग्री तो होती ही है।”

‘क्वेश्चन-बैंक’ या ‘चवन्नी छाप कुंजियाँ’ कह लें जिन्हें पढ़कर पास होने पर डिग्री नहीं, डिग्री का ‘झुनझुना’ मिलता है। दस-पंद्रह रुपयों की कुंजियों से कोई शैक्षिक रिकॉर्ड क्या बना लेगा?

“तुम्हें बुक्स चाहिए होंगी, बेझिझक मुझसे मांग लेना।” मेरे इस ऑफर को वह अस्वीकार नहीं कर पाई; फिर जाहिर है, मैनें बस उसकी छोटी सी शैक्षणिक सहायता की और फिर वह उसी गुलाबी मसूड़ों वाली मुस्कान के साथ मुझसे बोली- “नम्रता! थैनक्यू।” फिर मेरा टका सा जवाब होता, “कोई बात नहीं।”

दरअसल हृदय से चाहे कोई जितना उदार बन ले, अपने भीतर की विशिष्टता का जो अहं होता है, उसका प्रभाव व्यक्तित्व पर आ ही जाता है। मैं अपनी कुलीनता के गर्व से ज्यादा अछूती नहीं थी, और मुझे नहीं लगता इसमें मेरी कोई ख़ास गलती भी थी। यह गर्व की अनुभूति मुझे अपने समाज के संस्कारों और रीति-रिवाजों से सहज ही प्राप्त हुई थी। उस निर्धन बाला के साथ मेरी दोस्ती सहानुभूति और सहायता करने तक ही सीमित थी।

दो पुराने कपड़ों में कॉलेज आने वाली निर्जला, गाँव की सादा सी लड़की, मुझे प्रेम करती थी, परन्तु उसके प्रति मेरी अरूचि स्वभावगत थी। मेरे साथ उसका वार्तालाप उसी की ओर से प्रारम्भ होता था, अनिवार्य रूप से मेरे नाम के संबोधन के साथ- “नम्रता! मैनें तुम्हारे लिए कल रात एक सपना देखा था।” (मुझे आज भी अच्छी तरह वो दृश्य याद है, जब खाली पीरियड में हम गर्ल्स गार्डेन में बैठे थे, और उस सपने का जिक्र मैं यहाँ नहीं करूँगी, क्योंकि वो अपूर्ण है और उसके पूर्ण होने के कोई आसार नहीं)। मैं उसके सपने को सुनकर बहुत हँसी थी और उसे मन कर दिया कि इस वाहियात सपने का जिक्र किसी और से मत करना।

बी.ए. का पहला वर्ष गुजर गया। दूसरे वर्ष निर्जला की छोटी बहन भी कॉलेज में एडमिशन ले चुकी थी। दोनों बहनों में लगभग साल-डेढ़ साल का अंतर रहा होगा, और दोनो के मुँह की डिजाइन भी लगभग मिलती-जुलती थी। निर्जला कॉलेज आती, क्लास करती और न जाने किस उधेड़बुन में पड़ी रहती; चूँकि मुझे उसकी व्यक्तिगत बातों में दिलचस्पी थी नहीं तो मैंने उससे कभी कुछ भी नहीं पूछा। मुझे कॉलेज के माहौल में, वहाँ के हीर-रांझों के किस्सों में अथवा किसी भी तरह की गतिविधियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, मैं हर खबर से बेख़बर रहती, अपनी ही धुन में मस्त थोड़ी ऊल्लू जैसी लड़की, जैसी कि मूलतः मैं आज भी हूँ। सहेलियों से जो बातें पता चल जाती तो चल जाती। अपने इसी मिज़ाज़ के कारण मैं निर्जला तो क्या, अन्य लोगों के भी इतिहास-भूगोल की कोई जानकारी नहीं लेती थी।

एक दिन मैंने अपनी एक सहेली से निर्जला की तारीफ की और कहा- “निर्जला कितनी सीधी है ना, शान्त और मृदुभाषी।” उस प्रशंसा भाव पर मेरी सहेली ने निर्जला के बारे में जो प्रतिक्रिया दी, वो मेरे लिए सर्वथा नई तरह की बात थी। मुझे ज्ञात हुआ कि निर्जला के पिता पुलिस विभाग में दरोगा के ओहदे पर थे; ‘अनपढ़-गँवार’ पत्नी और दो बेटियाँ उनके मद पर आग में घी जैसी थीं, इसीलिए उन्होंने निर्जला की माँ को दोनों बेटियों समेत छोड़ कर दूसरा विवाह कर लिया था। निर्जला ने अपने पिता के ऊपर गुजारा-भत्ता का मुक़दमा दायर किया हुआ था। तभी अक्सर निर्जला जिला मुख्यालय आया-जाया करती थी- मेरी समझ में ये बात तभी आयी।

मेरी सहेली मुझसे बोली, “तुम्हे निर्जला सीधी लगती है, अपने बाप पर गुजारे-भत्ते का केस ठोका है इसने।”

“तो क्या बुरा किया निर्जला ने? इसके पिता अच्छे सरकारी पद पर हैं, अच्छा कमाते हैं, उनके अन्याय के कारण बीवी-बच्चियाँ लाचार जीवन जीने पर विवश हैं। निर्जला यदि अपने हक़ के लिए लड़ रही है तो उसके साहस की तो प्रशंसा की जानी चाहिए।” अपनी सहेली को दिये गए इस जवाब के बाद निर्जला के प्रति मेरे मन में श्रद्धा और सहानुभूति थोड़ी बढ़ गई।

स्नातक के दूसरे वर्ष निर्जला ने चार जोड़े समीज-सलवार एक साथ बनवाये। कैसे बनवाये? उसे पैसे कहाँ से मिले? कपड़े का बंदोबस्त कैसे हुआ? इस बात पर तंगदिमाग लड़कियाँ आपस में कौतुहलपूर्ण इशारे करती नज़र आईं। उस समय की हतबुद्धि ये भी न देख सकी कि उसकी बहन भी अब कॉलेज आने लगी थी। क्या उन बहनों का इतना भी हक़ नहीं कि अपने कमज़र्फ बाप की बेरहमी को दो-दो जोड़े कपड़ों से ढँक सकें; इसके अलावा वे कर भी क्या सकती थीं?

एक बात ज़रूर हुई थी- इन नए कपड़ों में निर्जला का व्यक्तित्व थोड़ा निखर आया था।

मुझे अपनी स्मृति में एक बात और कौंध रही है, उस समय एमवे (Amway) कंपनी की चेन-शृंखला वाले व्यापार की तर्ज़ पर, हमारे देश में कुकुरमुत्तों की भाँति हजारों कम्पनियाँ उग आईं थीं, जो लुभावने पुरस्कारों के लालच देकर लोगों को, सदस्यता और निश्चित रकम के निवेश का व्यापार कर रही थीं। ऐसी कंपनियों में लोग फंस रहे थे, लुट रहे थे, और ये कंपनियाँ रातो-रात मुनाफ़ा कमा कर चम्पत हो जातीं। ऐसी ही किसी कंपनी की स्कीम के बारे में एक बार निर्जला ने मुझे भी बताया था, मैंने अपनी तरफ से उसे सावधान कर दिया, क्योंकि मुझे आलरेडी पाँच सौ की चपत लग चुकी थी (पापा तक बात पहुँची नहीं, पर मम्मी ने खूब खरी-खोटी सुनाई थी)। स्पष्ट है लाचारी इंसान को हर उस सम्भव स्थान तक दौड़ाती है, जहा तक उसके पैरों में बल हो। पता नहीं कौन-कौन सी जुगत किया करती थी वो लड़की अपनी कर्मभूमि में। उस कंपनी के साथ निर्जला का क्या नफ़ा-नुकसान हुआ, मुझे उसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं।

अब तक हम सब बी.ए. उत्तीर्ण करके एम.ए. की डिग्री के पायदान पर खड़े हो चले थे। मेरी तरह निर्जला ने भी भूगोल विषय से एम.ए. करने का निश्चय किया। एम.ए. की कक्षाएँ प्रारम्भ हुईं तो, हमारी कक्षा में एक नई लड़की ने प्रवेश लिया था- ‘शशि’ जो गोरखपुर से आती थीं। वे आयु में मुझसे कुछ बड़ी थीं, अतः मैं उन्हें ‘शशि दीदी’ ही कहती थी। उनसे मेरी घनिष्ठता धीरे-धीरे बढ़ते हुए काफी प्रगाढ़ हो गई थी। पिता की एयरफ़ोर्स जॉब के कारण उन्हें भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में रहने और पढ़ने का काफी तर्ज़ुबा था, साथ ही उनका सौम्य और मृदु व्यवहार उनके व्यक्तित्व का सबसे ज्यादा आकर्षक पक्ष था। शशि दीदी के साथ निर्जला थोड़े ही समय में हार्दिक रूप से जुड़ गई। निर्जला को गोरखपुर से कोई भी काम होता तो वो शशि दीदी की मदद लेती थी, उनके घर जाती थी, ठहरती थी; प्रतियोगी परीक्षाओं आदि को देने के सिलसिले में। अब निर्जला की कई बातें मुझे शशि दीदी द्वारा ज्ञात होने लगी थीं।

एक दिन बातों-बातों में शशि दी ने मुझे बताया कि निर्जला जो केस अपने पिता के विरुद्ध लड़ रही थी, उसमे वह जीत गयी है। “अरे वाह! ये तो बड़ी प्रसन्नता की बात है, अब तो सम्भवतः निर्जला का जीवन कुछ सरल होगा, उसकी मेहनत चलो रंग तो लाई।” सचमुच इस समाचार ने मुझे रोमांचित कर दिया था। ‘हक़ मांगने से ना मिले तो छीन लेना चाहिए’ इस नारे को तो निर्जला ने वाकई सार्थक कर दिया था। निर्जला- न तो फिल्मी हीरोइनों की अदा से भरी थी, ना ही वो ‘स्मार्ट- ब्यूटीफुल’ छात्रा के खाँचे में ही फिट बैठती थी; अपने मामा के सहारे पर आश्रित निर्जला ‘डिग्री का झुनझुना’ पाने की आस में कॉलेज आती।

एम. ए. आते-आते यदा-कदा निर्जला एक लड़के के साथ दिखाई देने लगी; उस दुबले-पतले गहरे साँवले रंग के लड़के को बी.ए. की हिन्दी कक्षाओं में देखा था मैंने। उसके व्यक्तिव का पूरा ‘नख-शिख’ पतला और लंबा गढ़ा हुआ था तथा सामाजिक स्तर भी सम्भवतः निर्जला के ही आस-पास का था। मेरी सहपाठिनीयों ने उस लड़के को ‘छिपकली’ के उपनाम से मंडित किया हुआ था, और निर्जला के लिए कौतूहलपूर्ण इशारे वो तो स्वभाविक बात थी। मुझे जाने क्या सूझी, मैं एक दिन निर्जला से उसके बारे में पूछ ही बैठी। निर्जला का उत्तर- “नम्रता! वो मेरे मामा के पड़ोस में रहते हैं; मेरा भाई तो है नहीं, कहीं अकेले जाना हो तो इन्हें लेकर जाती हूँ, हेल्प करते हैं मेरी।”

इसके बाद मैंने उससे कोई पूछताछ नहीं की, कारण ज्यादा खोदना मेरी रुचि का विषय नहीं था; और दूसरे मुझे अपने समाज का भान तो था ही, कि कभी भी अन्यत्र जाने के लिए अकेली लड़की का एक अवलंबन अवश्य होना चाहिए, जो लता जैसी लड़की को सहारा देकर सीधा खड़ा रख सके।
हमारे एम.ए. के अंतिम वर्ष की कक्षा में, भूगोल विषय के शैक्षिक भ्रमण पर जाने से निर्जला ने मना कर दिया था, क्योंकि इसके लिए जहाँ तक मुझे याद है दो हजार रुपये विभाग में जमा करने थे। निर्जला ने विभागाध्यक्ष से मिलकर अपनी आर्थिक समस्या का हवाला देकर इस शुल्क को जमा करने में अपनी असमर्थता जताई थी। हमारे विभागाध्यक्ष महोदय ने उसकी समस्या को गंभीरता से लिया और पूरी दया व कृपा के साथ इस शुल्क को विभाग की ओर से उपलब्ध कराया था।

मैं इस बात से थोड़ी हैरान थी, कि निर्जला को उसके पिता से गुजारा-भत्ता तो मिलने ही लगा होगा, फिर निर्जला ने अपनी आर्थिक समस्या को इस तरह क्यों उजागर किया? कभी-कभी अदालती फैसले देवस्थान पर पड़े पैसों की तरह होते हैं, जो मूल्यवान तो होते हैं, पर गरीब जनता उन्हें उठाने का दुस्साहस नहीं कर सकती। ये बात उस समय मुझे नहीं पता थी।

हम लोग एम.ए. की डिग्री के साथ स्वतंत्र हो चुके थे- उस घर जैसे कॉलेज से, मोहल्ले वाले गुरुजनों से और नौ हाथ की दूरी से। एक दिन शशि दीदी ने फ़ोन पर निर्जला के बारे में मुझे बताया कि देवरिया में निर्जला किसी कंपनी के लिए सेल्स गर्ल का काम करने लगी है। मुझे ज्यादा हैरत नहीं हुई। हमारी धन्य शिक्षा प्रणाली जिसमें एक थर्ड डीविज़न एम.ए. पास लड़की गली-गली, घर-घर जाकर अपना प्रारब्ध ढूँढ रही थी, और वो प्रारब्ध जिसकी बदौलत निर्जला अपनी माँ और बहन के उत्तरदायित्व को अपने नाजुक कंधों पर ढो सके। धन्य तो हमारा बाज़ारवाद भी है, जहाँ काम से कम इतनी गुंजाइश तो है कि एक थर्ड डिवीज़नर लड़की भूखो तो न मरेगी।

मेरा एडमिशन बी.एड. में हो चुका था; मेरा बी.एड. कॉलेज दोहरीघाट नामक तहसील कस्बे में था। यूँ तो मैं कॉलेज के हॉस्टल में रहती थी, पर छुट्टियों में घर आने-जाने के लिए अकेले सफ़र करना मैंने प्रारम्भ कर दिया था। देवरिया तक ट्रेन से जाती, फिर बस से दोहरीघाट। इस देवरिया-दोहरीघाट मार्ग से मुझे एक तरह का विशेष लगाव था, क्योंकि इसी मार्ग पर मेरे गाँव व ननिहाल सड़क पर खड़े होकर मुझे हाथ हिलाते हुए से लगते। मुझे एक बार दोहरीघाट जाना था, मैं ट्रेन से उतर कर रिक्शे से बस अड्डे की ओर जा रही थी, मुझे सड़क पर निर्जला जाती हुई दिखाई दी। मैने उसे पीछे से ही पहचान लिया और उसे आवाज़ लगाई, “निर्जला!” उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा और उसी गुलाबी मसूड़ो वाली मुस्कान के साथ बोली, “अरे नम्रता! मैं आफिस जा रही हूँ।”

“और मैं अपने बी.एड. कॉलेज।” रिक्शा से जाते हुए उसकी बगल से गुजरते हुए उससे मेरी यही संक्षिप्त बातचीत हुई थी। आज सोचती हूँ कि काश! रिक्शा रुकवा कर उससे कम से कम उसकी व्यक्तिगत बातों के बारे में पूछ लेती, उसका पुरसाहाल जान लेती, तो आजतक ये बात मुझे ना खलती कि निर्जला से वो मेरी आख़िरी मुलाकात थी।

इसके बाद लगभग वर्ष 2008 में शशि दीदी मेरे घर अपने विवाह का निमंत्रण पत्र देने आईं। शायद मार्च का ही महीना था। वार्तालाप के मध्य शशि दीदी ने मुझे एक ऐसी बात बताई जिसे सुनकर मैं स्तब्ध रह गई। शशि दीदी मुझसे पूछी, “अरे! सुनो, तुम्हे निर्जला याद है ना?” मैं बोली, “हाँ, क्यों नही, पूरे पाँच वर्ष हम सब साथ पढ़े थे, उसे कैसे भूल सकती हूँ? शादी हो गई उसकी, उससे बात होती है आपकी?” मेरे सवालों की झड़ी पर शशि दीदी झल्लाते हुए बोलीं, “बस करो बेटा, वो मर गई।” मैं भौचक्का सी उनसे बोली, “क्या बात कर रही हैं?” आगे शशि दीदी ने जो बताया शायद उसकी कल्पना किसी ने भी ना की होगी। वो बोलीं, “निर्जला सेल्सगर्ल की जॉब करती थी, पता है ना।”

“हाँ, मैं मिली थी उससे एकबार रास्ते में।” मेरे बताने के बाद उन्होंने कहा- “अगस्त 2007 में वो अपने ऑफिस जा रही थी, उसके पापा ने जीप से उसका एक्सीडेंट करा दिया, मैंने एक दिन उसके घर फ़ोन किया तो उसकी छोटी बहन बताने लगी; मरने के पहले ही निर्जला अपनी छोटी बहन की शादी उसकी पसंद के लड़के से तय कर गई थी, अब तो उसकी शादी भी हो चुकी है।” शशि दीदी ने सधे अंदाज़ में इतनी बड़ी बात कुछ वाक्यों में कितनी सरलता से बता दी थी।

मुझे निर्जला से अपनी वो अंतिम भेंट याद आने लगी, आज मैं सोच रही थी, ओह! यदि मैंने रिक्शा रुकवा लिया होता तो उससे दो बातें कह लेती और पूछती कि बताओ! तुमने अपने सीधे-सादे चेहरे के पीछे कौन कौन से कारनामे किए हैं? तुम्हारी जैसी लड़कियाँ घरों में चुपचाप रोटियाँ बेलने के लिए नहीं बनी होती, तुम जैसी लड़कियाँ प्रस्तरों और शूलों के बीच पलकर, बढ़कर, उन्हीं प्रस्तरों-शूलों में राह बना कर, उसी राह पर न्यौछावर होने के लिए बनी होती हैं। शशि दीदी की इस शोकपूर्ण सूचना पर उस समय मेरी आँखों मे ‘दो बूँद’ पानी भले ना आया पर हृदय के अंदर पश्चाताप, सहानुभूति, दया, माया सब आर्तनाद कर रहे थे। शशि दीदी चली गईं, और निर्मला के मरने की खबर एक-आध लोगों से बाँट कर मैं निश्चिंत हो गई।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ने लगा और जीवन के कटु अनुभवों से मेरा सामना होता गया, ऐसा लगने लगा जैसे मैं निर्जला को भूलने की बजाय कुछ ज्यादा ही याद करने लगी हूँ। उसकी पीड़ा, उसका कष्ट, उसका संघर्ष बार-बार सोचने पर विवश करता है। उसकी यादें भीतर ही भीतर मुझे कचोटती हैं, जैसे उसकी आत्मा मुझसे कह रही हो, “नम्रता! क्या अधिकार माँगना गलत है? मैंने कोई अपराध किया था? मुझे न्याय नहीं मिला, आज भी मेरे पिता की जीप के टायरों में मेरी हत्या के अवशेष चिपके हैं, और उसकी दुर्गन्ध भी किसी को नहीं आती।” मेरा व्यथित मन चीखना चाहता है और पूछना चाहता है कि निर्जला के मांस के गुलाबी रेशे किसके दांतों में फँसे हैं? उसके अपने सगे पिता की दाँतों में? ये ऑनर किलिंग इसलिए हुई, क्योंकि उसके सगे पिता की मूँछों का शेयर सूचकांक क्या इतना गिर गया था कि उसकी भरपाई अपनी बेटी के प्राणों की ‘लिवाली’ से ही होती। क्या थोथे आदर्शवादी और बेढब समाजवादी ये बताएंगे कि उस निरीह निर्जला का गुनाह क्या था? उसका हत्यारा खुलेआम अब भी कहीं चैन से सो रहा होगा और ‘निर्जला’ चुपचाप दमतोड़ कर नदी में विसर्जित हो गई।

मैं आज भी सोचती हूँ कि यदि वो जीवित होती तो मेरी बाकी सहेलियों की तरह वो भी ‘व्हाट्सएप’ और ‘फेसबुक’ पर होती; मुझे फ़ोन करती और बताती, “नम्रता! मेरे दो बच्चे हैं, प्यार करने वाला पति है, मैं बहुत खुश हूँ।” हो न हो वह ‘छिपकली जैसा लड़का’ ही उसे अंगीकार कर लेता। मैं आज भी सोचती हूँ- निर्जला अपने पिता के पास अवश्य गयी होगी। अपनी तंगहाली का उन्हें ब्यौरा दिया होगा, रोई होगी, गिड़गिड़ाई होगी। उनसे आर्थिक सहायता माँगी होगी; फिर भी जब उसके पिता ने नहीं सुना होगा तो थक-हार कर उसने गुजारे भत्ते के लिए न्यायालय में आवेदन किया होगा। उसे न्याय मिल भी गया, फिर भी वो सड़कों पर एड़ियाँ रगड़-रगड़ कर अपने स्वावलंबन का परचम लहरा रही थी।

उसकी व्यथा-कथा से द्रवित होकर मैंने उसकी स्मृति को रेखांकित करने का निश्चय कई वर्ष पूर्व ही किया था। सोचती हूँ- काश निर्जला कहीं से आकर फिर कहती- “नम्रता! थैनक्यू!”