आज सभा में लाठी चार्ज हुआ। प्रायः पांच हजार निहत्थे और शान्त मनुष्यों पर पुलिस के पचास जवान लोहबन्द लाठियाँ लिये हुए टूट पड़े। लोग अपनी जान बचाकर भागे; पर भागते-भागते भी प्रायः पाँच सौ आदमियों को सख्त चोटें आई और तीन तो बेहोश होकर सभा-स्थल में ही गिर पड़े। तीन, चार प्रमुख व्यक्ति गिरफ़्तार करके जेल भेज दिए गए।

पुलिस ने झंडे के विशाल खम्भे को काटकर गिरा दिया और आग लगा दी । तिरंगा झंडा फाड़ कर पैरों तले रौंद डाला गया। सबके हृदय में सरकार की सत्ता का आतंक छा गया।

प्रकट रूप से विजय पुलिस की ही हुई। उनके सामने सभी लोग भागते हुए नजर आए। और यदि किसी ने अपनी जगह पर खड़े रहने का साहस दिखलाया तो वह लाठियों की मार से धराशायी कर दिया गया। परन्तु इस विजय के होते हुए भी उनके चेहरों पर विजय का उल्लास नहीं था, प्रत्युत ग्लानि ही छाई थी। उनकी चाल में आनन्द का हल्कापन न था, बरन ऐसा मालूम होता था कि जैसे पैर मन-मन भर के हो रहे हों। हृदय उछल नहीं रहा था बरन एक प्रकार से दबा सा जा रहा था।

पुलिस लाइन में पहुँच कर सिपाही लाठी चार्ज की चर्चा करने लगे। सभी को लाठी चार्ज करने, निहत्थे निरपराध व्यक्तियों पर हाथ चलाने का अफ़सोस हो रहा था। राम खिलावन ने अपनी कोठरी में जाकर अन्दर से दरवाज़ा लगा लिया और लाठी को चूल्हे में जला दी। उसकी लाठी के वार से एक सुकुमार बालक की खोपड़ी फट गई थी। उसने मन में कहा बिचारे निहत्थे और निरपराधों को कुत्तों की तरह लाठी से मारना, राम
राम यह हत्या! किसके लिए? पेट के लिए? इस पापी पेट का तो जानवर भी भर लेता है। फिर हम आदमी होकर इतना पाप क्यों करें? इस बीस रुपल्ली के लिए यह कसाईपन? न, अब तो यह न हो सकेगा। जिस परमात्मा ने पेट दिया है वह अन्न भी देगा। लानत है ऐसी नौकरी पर; और दूसरे दिन नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अपने देश को चला गया।

[2]

थानेदार बरक़तउल्ला लाठी चार्ज के समय चिल्ला-चिल्लाकर हुक्म दे रहे थे “मारो सालों को”, “आए हैं स्वराज लेने”, “लगे खूब कस कसके”। परन्तु अपने क्वार्टर्स में पहुँचते-पहुँचते उनका जोश ठंडा पड़ गया। वे जबान के खराब अवश्य थे पर हृदय के उतने खराब न थे। दरवाजे के अन्दर पैर रखते ही उनकी बीवी ने कहा- “देखो तो यह गफूर कैसा फूट-फूटकर रो रहा है। क्या किया है आज तुमने? बार-बार पूछने पर भी यही कहता है कि ‘अब्बा ने गोपू को जान से मार डाला है’, मेरी तो समझ में ही नहीं आता कि क्या हुआ?”

सुनते ही थानेदार साहब सर थामकर बैठ गए। गोपाल बहुत सीधा और प्रेमी लड़का था। थानेदार का लड़का और गोपाल एक ही कक्षा में पढ़ते थे और दोनों में खूब दोस्ती थी। थानेदार और उनकी बीबी दोनों ही गोपाल को अपने लड़के की ही तरह प्यार करते थे। थानेदार को बड़ा अफ़सोस हुआ, बोले “आग लगे ऐसी नौकरी में। गिरानी का जमाना है वरना मैं तो इस्तीफ़ा देकर चल देता। पर करें तो क्या करें? घर में बीवी-बच्चे हैं, बूढ़ी माँ है, इनका निर्वाह कैसे हो? नौकरी बुरी जरूर है पर पेट का सवाल उससे भी बुरा है। आज 60) माहवार मिलते हैं, नौकरी छोड़ने पर कोई बीस रुपल्ली को भी न पूछेगा – पापी पेट के लिए नौकरी तो करनी ही पड़ेगी, पर हाँ इस हाय-हत्या से बचने का एक उपाय है। तीन महीने की मेरी छुट्टी बाक़ी है। तीन महीने बहुत होते हैं। तब तक यह तूफ़ान निकल ही जायगा। यह सोचकर उसने छुट्टी की दरख्वास्त दूसरे ही दिन दे दी।

[3]

उधर कोतवाल बख्तावर सिंह का बुरा हाल था। मारे रंज के उनका सिर दुखने लगा था। बख्तावर सिंह राजपूत थे। उन्होंने टॉड का राजस्थान पढ़ा था । राजपूतों की वीरता की फड़काने-वाली कहानियाँ उन्हें याद थीं। चित्तौड़ के जौहर, जयमल और फत्ता के आत्म-बलिदान, और राणा प्रताप की बहादुरी के चित्र उनके दिमाग़ में रह-रह के चमक उठते थे। सोचते थे कि मैं समस्त राजपूत जाति की वीरता का वारिस हूँ। उनका सदियों का संचित गौरव मुझे प्राप्त है। मेरे पूर्वजों ने कभी निहत्थों पर शस्त्र नहीं चलाए, किन्तु मैंने आज यह क्या कर डाला? ऐसे मारने से तो मर जाना अच्छा। पर पापी पेट जो न करावे सो थोड़ा।

इसी संकल्प-विकल्प में पड़कर उन्होंने रात को भोजन भी नहीं किया। आखिर भोजन करते भी तो कैसे? उस घायल बच्चे का रक्तरंजित कोमल शरीर, उसकी सकरुण चीत्कार और उसकी हृदय को पिघला देनेवाली बेधक दृष्टि का चित्र उनकी आँखों के सामने रह-रहकर खिंच जाता था। उसकी याद उनके हृदय को टुकड़े-टुकड़े किए डालती थी। इस प्रकार दुखते हुए हृदय को दबाकर वे कब सो गए, कौन जाने?

सवेरे उठने पर उन्हें याद आई कि कल ही जो उन्हें तनखाह के तीन सौ रुपये मिले थे उसे वे कोट की जेब में ही रखकर सो गए थे। कहीं किसी ने निकाल न लिये हों इस ख्याल से झटपट उन्होंने कोट की जेब में हाथ डाला और नोट निकाल कर गिनने लगे। एक-एक करके गिने, सौ-सौ के तीन नोट थे। उन पर सम्राट की तसवीर बनी थी और गवर्नमेन्ट की तरफ़ से किसी के हस्ताक्षर पर यह लिखा था कि “मैं माँगते ही एक सौ रुपया देने का वायदा करता हूँ” रुक्का इन्दुल तलब प्रॉमिसरी नोट-माँगते ही एक सौ रुपये! इसी प्रकार एक, दो, तीन, एक ही महीने में तीन सौ!! एक वर्ष में छत्तीस सौ, तीन हजार छै सौ; तीस वर्ष में एक लाख आठ हजार, हर साल तरक्की मिलेगी, फिर तीस साल के बाद पेन्शन और ऊपर से!! इसी उधेड़-बुन में थे कि इतने ही में टेलीफोन की घंटी बजी। वह चट से टेलीफोन के पास गए बोले “हल्लो”, उधर से आवाज आई “डी० एस० पी० और आप कौन हैं?” इन्होंने कहा “शहर कोतवाल’, शहर कोतवाल का अधिकार पूर्ण शब्द उनके कानों में गूंज गया। उधर से फिर आवाज आई “अच्छा तो कोतवाल साहब! आज 11 बजे जेल के भीतर कल के गिरफ़्तार-शुदा कैदियों का मुकदमा होगा। उसमें आपकी गवाही होगी। आप ठीक 11 बजे जेल पर पहुँच जाइये।” कोतवाल साहब ने कहा, “बहुत अच्छा।”

अब कोतवाल साहब अपने दफ़तर के काम में लग गए। आफिस में पहुँचते ही उनका रोज़ की ही तरह कुड़-कुड़ाना शुरू हो गया। कोतवाली में काम बहुत रहता है, बड़ा शहर है दिन भर काम करते-करते पिसे जाते हैं। एड़ी चोटी का पसीना एक हो जाता है। खाने तक की फुरसत नहीं मिलती। चौबीसों घंटे गुलामी बजानी पड़ती है, तब कहीं तीन सौ रुपल्ली मिलते हैं। तीन सौ में होता ही क्या है? आजकल तो पाँच सौ से कम में कोई इज्जतदार आदमी रह ही नहीं सकता। इसी के लिए झूठ, सच, अन्याय, अत्याचार क्या-क्या नहीं करना पड़ता है पर उपाय भी तो कुछ नहीं है। इस छै फिट के शरीर को कायम रखने के लिए पेट में तो कुछ झोंकना ही पड़ेगा। क्या ही अच्छा होता यदि भगवान् पेट न बनाता।” इन्हीं विचारों में समय हो गया और कोतवाल साहब ठीक 11 बजे गवाही देने के लिए जेल को चल दिए।

[4]

लाठी चार्ज का हुक्म देने के बाद ही मजिस्ट्रेट राय साहेब कुन्दनलाल जी को बड़े साहब का एक अर्जेन्ट रुक्का मिला। साहब ने उन्हें फ़ौरन बंगले पर बुलाया था। इधर लाठी चार्ज हो ही रहा था कि उधर वे मोटर पर सवार हो बड़े साहब के बंगले पहुँचे। काम की बातों के समाप्त हो जाने पर, उन्हें लाठी चार्ज कराने के लिए धन्यवाद देते हुए बड़े साहब ने इस बात का भी आश्वासन दिया कि राय बहादुरी के लिए उनकी शिफारिस अवश्य की जायगी। बड़े साहब का उपकार मानते हुए राय साहब कुन्दनलाल अपने बंगले लौटे। उन निहत्थों पर लाठी चलवाने के कारण उनकी आत्मा उन्हीं को कोस रही थी। हृदय कहता था कि यह बुरा किया। लाठी चार्ज बिना करवाए भी तो काम चल सकता था। आखिर सभा हो ही जाती तो अमन में क्या खलल पड़ जाता? वे लोग सभा में किसी से मारपीट करने तो आए न थे। फिर मैंने ही उन्हें लाठी से पिटवा कर कौन सा भला काम कर डाला? किन्तु दिमाग ने उसी समय रोक कर कहा- “यहाँ भले-बुरे का सवाल नहीं है, तुमने तो अपना कर्त्तव्य पालन किया है। स्वयं भगवान कृष्ण ने कर्त्तव्य के लिए निकट सम्बन्धियों तक को मारने का उपदेश अर्जुन को दिया था। फिर तुम्हारा कर्त्तव्य क्या है? अपने अफसर की आज्ञा का पालन करना। आतंक जमाने के लिए लाठीचार्ज कराने का तुम्हें हुक्म था। तुम सरकार का नमक खाते हो, उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते। आज्ञा मिलने पर उचित-अनुचित का विचार करने की ज़रूरत ही नहीं। स्वयं धर्म-नीती के ज्ञाता पितामह भीष्म ने दुर्योधन का नमक खाने के ही कारण, अर्जुन का पक्ष सत्य होते हुए भी दुर्योधन का ही साथ दिया था। इसी प्रकार तुम्हें भी अपना कर्त्तव्य करना चाहिए, नतीजा बुरा हो चाहे भला।”

पर फिर उनके हृदय ने काटा, “न जाने कितने निरपराधियों के सिर फूटे होंगे?” दिमाग ने कहा, “फूटने दो। जब तक सरकार की नौकरी करते हो, तब तक तुम्हें उसकी आज्ञा का पालन करना ही पड़ेगा, और यदि आज्ञा का पालन नहीं कर सकते हो तो ईमानदारी इसी में है कि नौकरी छोड़ दो। माना कि आखिर ये लोग स्वराज्य के लिए ही झगड़ रहे हैं। उनका काम परमार्थ का है; सभी के भले के लिए है, पर किया क्या जाए? नौकरी छोड़ दी जाए तो इस पापी पेट के लिए भी तो कुछ चाहिए? हमारे मन में क्या देश-प्रेम नहीं है? पर खाली पेट देश-प्रेम नहीं हो सकता। आज नौकरी छोड़ दें तो क्या स्वराज्य वाले मुझे 600 रु. दे देंगे? हमारे पीछे भी तो गृहस्थी लगी है, बाल-बच्चों का पेट तो पालना ही होगा।” इसी प्रकार सोचते हुए वे अपने बंगले पहुँचे।

घर पहुँचने पर मालूम हुआ कि पत्नी अस्पताल गयी है। लाठीकाण्ड में लड़के का सिर फट गया है। उनका कलेजा बड़े वेग से धड़क उठा। उनका एक ही लड़का था। तुरंत ही मोटर बढ़ायी, अस्पताल जा पहुँचे। देखा कि उनकी स्त्री गोपू को गोद में लिए बैठी आँसू बहा रही है। गोपू के सिर में पट्टी बँधी है और आँखें बंद हैं। उन्हें देखते ही पत्नी ने पीड़ा और तिरस्कार के स्वर में कहा- “यह है तुम्हारे लाठीचार्ज का नतीजा।”

उनका गला रुँध गया और आँसू भी वेग से बह चले। राय साहब कुन्दनलाल के मुँह से एक शब्द भी न निकला। इतने ही में डॉक्टर ने आकर उन्हें सांत्वना देते हुए कहा- “कोई खतरे की बात नहीं है। घाव गहरा ज़रूर है पर इससे भी गहरे-गहरे घाव भी अच्छे हो जाते हैं, आप चिंता न कीजिए।”

राय साहब ने पत्नी से पूछा- “आखिर तुमने इसे वहाँ जाने ही क्यों दिया?”

पत्नी ने कहा- “तो मुझसे पूछ के ही तो वहाँ गया था न?”

रात भर गोपू बेहोश रहा और दूसरे दिन भी बेहोशी दूर न हुई। दूसरे दिन 11 बजे दिन से जेल में मुकदमा होने वाला था। परन्तु न्यायधीश ठीक समय पर न पहुँच सके। आज सज़ा सुनानी थी। मामला था, एक तेरह साल की बालिका को बेचने के लिए भगा ले जाने का, जुर्म साबित हो चुका था। न्यायधीश के द्वारा उसे छः महीने की सख्त क़ैद सज़ा दी गयी थी।

फैसला सुनाकर न्यायधीश महाशय जेल आए। कोतवाल और राय साहब कुन्दनलाल की गवाही हो जाने पर अभियुक्तों में से एक दो साल की सख्त क़ैद और 2000) जुरमाना, दूसरे को डेढ़ साल की सख्त क़ैद और 1500) जुरमाना, तीसरे को एक साल की सख्त क़ैद और 500) जुरमाना की सज़ा दे दी गयी। अभियुक्तों ने मुकदमों में किसी प्रकार का भाग नहीं लिया और न पेशी ही बढ़वायी, इसलिए मुकदमा करीब एक घंटे में ही समाप्त हो गया।

तीनों अभियुक्त प्रतिष्ठित सज्जन थे और राय साहब की जान-पहिचान के थे। मुकदमा ख़त्म हो जाने पर राय साहब ने उनसे माफ़ी मांगते हुए कहा, “क्षमा करना भाई, इस पापी पेट के कारण लाचार हैं, वरना क्या हमारे दिल में देश-प्रेम नहीं है? यह कहकर उन्होंने अपनी आत्मा को संतोष दे डाला और जल्दी-जल्दी अस्पताल आए। गोपू की हालत और भी ज़्यादा खराब हो गयी थी। उसकी नाड़ी क्षीण पड़ती जा रही थी। राय साहब के पहुँचने पर उसने पहिली ही बार आँखें खोलीं। उसके मुँह पर हलकी-सी मुस्कराहट थी। धीमी आवाज़ से उसने कहा- “बन्दे मा.. ‘म’ की ध्वनि नहीं निकल पायी; ‘म’ के साथ ही उसका मुँह खुला रह गया, और आँखें सदा के लिए बंद हो गयीं। उसकी माता चीख मारकर लाश पर गिर पड़ी। राय साहब के शून्य हृदय में बार-बार प्रश्न उठ रहा था, “यह सब किसके लिए?” और मस्तिष्क से प्रतिध्वनि उसका उत्तर दे रही थी- “पापी पेट के लिए।”