Jayant Parmar

पड़

अनुवाद: स्वयं लेखक द्वारा 

‘पड़’ – मृत जानवर, जिसे ढेड लोग कावंरी से उठा कर ले आते हैं और उसकी खाल उधेड़ने के बाद खाने के लिए उसका मांस ले जाते हैं।

आसमान पर गिद्धों का
झुण्ड मंडराया था
पंख और चोंच की आवाज़ों ने
खिड़की-खिड़की दस्तक दी –
“बैल मरा है – बैल मरा है”
हवा सी फैल गई
खबर
गली-गली के कोनों में
सारी बस्ती के चेहरे पर रौनक थी
निकल पड़े थे सब अपने घरों से
मैं हाथों में पत्थर लेकर गिद्धों पर
फेंका करता था
उनको दूर भगाता था
गिद्ध भी हम पर गुस्सा करते थे
मुझे बराबर याद है
अब तक जिन गिद्धों
को मैंने
पत्थर मारे थे
जिन्हें रखा था
भूखा
आज वे मेरी मौत की
खुशखबरी सुन कर
मेरी लाश पर
टूट पड़े हैं
और मेरे अंदर के
बैल की
बोटी-बोटी नोच कर
मुझसे
बदला
ले रहे हैं।