भगत सिंह पर आधारित फिल्मों में अक्सर आने वाला यह गीत ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा’ असल में बांके दयाल जी की एक कविता है जो अंग्रेजों के खिलाफ हो रहे एक आन्दोलन के दौरान सुनायी गयी थी। यह आन्दोलन ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए ‘पंजाब कोलोनाइजेशन एक्ट 1907’ के खिलाफ हो रहा था, जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय और अजित सिंह कर रहे थे। यह गीत इतने जोश और उत्साह के साथ सभी आन्दोलनकारियों द्वारा गया जाता रहा है कि उस आन्दोलन को ‘पगड़ी सम्भाल जट्टा आन्दोलन’ भी कहा जाता है। बाद में भगत सिंह की टोली के लोगों ने भी यह गीत काफी गुनगुनाया है। 

इस कविता से प्रेरित गीत तो काफी सुन चुके हैं, लेकिन यह कविता अपने मूल स्वरुप और भाषा में भी एक यादगार कविता है

पगड़ी सम्भाल जट्टा

पगड़ी सम्भाल जट्टा
पगड़ी सम्भाल ओ।

हिंद सी मंदर साडा, इस दे पुजारी ओ।
झलेंगा होर अजे, कद तक खुआरी ओ।
मरने दी कर लै हुण तूं, छेती तैयारी ओ।
मरने तों जीणा भैड़ा, हो के बेहाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

मन्नदी न गल्ल साडी, एह भैड़ी सरकार वो।
असीं क्यों मन्निए वीरो, इस दी कार वो।
होइ के कट्ठे वीरो, मारो ललकार वो।
ताड़ी दो हत्थड़ वजदी, छैणियाँ नाल वो।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

फ़सलां नूं खा गए कीड़े।
तन ते न दिसदे लीड़े।
भुक्खाँ ने ख़ूब नपीड़े।
रोंदे नी बाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

बन गे ने तेरे लीडर।
राजे ते ख़ान बहादर।
तैनूं फसौण ख़ातर।
विछदे पए जाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?

सीने विच खावें तीर।
रांझा तूं देश ए हीर।
संभल के चल ओए वीर।
रस्ते विच खाल ओ।
पगड़ी सम्भाल ओ जट्टा?


चित्र श्रेय: N K Virk


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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