पहाड़ में पगडण्डियाँ
मार्ग भी होती हैं, गन्तव्य भी,
पहाड़ में होना
एक पगडण्डी पर होना है,
यहाँ गाँव भी उगता है
तो किसी पगडण्डी के डण्ठल पर

हर शाम, एक अनबूझे आनन्द में
कूद जाता है पहाड़ से नीचे सूरज
और अंधेरे में सुनायी देती है
जंगल की आवाज़
अपने पाषाणकालीन स्वरूप में

अलस्सुबह किसी पहाड़ के पीछे से
फिर उछलकर निकलता है सूरज
और पगडण्डी के रास्ते
प्रविष्ट हो जाता है
भोर का संदेस लेकर
कच्चे-पक्के मकानों में एक-सा

पगडण्डियाँ धमनियाँ और शिराएँ हैं
जिनसे गुज़रती हैं
गीले और सूखे पत्ते लाती औरतें
सब्ज़ियाँ बाज़ार ले जाते किसान
ससुराल जाती डोलियाँ
स्कूल जाते बच्चे
पलायन करते परिवार और युवक

सर्दियों में, पहाड़ पर गिरती है बर्फ़
और हफ़्ते भर नहीं पिघलती
रुक-सा जाता है जीवन का कलरव
पगडण्डियाँ, पलायन कर गयीं
एड़ियों की गर्मी चाहती हैं!

देवेश पथ सारिया
देवेश पथ सारिया एक हिन्दी कवि-गद्यकार एवं अनुवादक हैं। कविता संकलन : अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025), नूह की नाव (2022)।‌ कथेतर गद्य : छोटी आँखों की पुतलियों में (ताइवान डायरी, 2022)। कहानी संग्रह : स्टिंकी टोफू (2025)। अनुवाद : सपने बुनता फाॅरमोसा : ताइवानी कविताएँ (2026), यातना शिविर में साथिनें (2023)। अन्य भाषाओं में पुस्तकें : A Toast to Winter Solstice (अंग्रेज़ी अनुवाद : शिवम तोमर)। पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2023), स्नेहमयी चौधरी सम्मान (2025)। अन्य भाषाओं मे अनुवाद : देवेश की रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, मंदारिन‌ (चीनी), स्पेनिश, रूसी, ताइवानी, नेपाली, उर्दू, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, असमिया, भोजपुरी, राजस्थानी, हरियाणवी, गढ़वाली और कुमाऊँनी में हुआ है। संपादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका (golchakkar.org) ईमेल : [email protected]