पानी

आदमी को पानी की तरह होना चाहिए, निरंतर बहता हुआ
जब जैसी जगह पायी, वैसा उसने रूप बनाया,आकार बनाया
जब ज़रूरत हुई, जो रंग मिला, उसी के जैसा हो गया
पर अपनी सादगी और निर्मलता नहीं खोई
अपनी शीतलता भी बरकरार रखी।
रोकने की तो हर पल कोशिश करते हैं सभी
पर जल की मुक्त धारा कहाँ रुक पाती है
उसका फितूर है आगे बढ़ना
आदमी को भी ठीक वैसा ही होना चाहिए, पानी की तरह
‌निरंतर बहता हुआ।