‘Pehla Sabaq’, a poem by Nirmal Gupt

हाथ में गुलेल लिए
एक शैतान बच्चा
गुज़रा गली से
और गली के पुराने
मेहराबदार मकानों की
मुँडेरों पर पसरे कबूतर
फुर्र से उड़े
और ग़ायब हो गए
आकाश की गहराइयों में कहीं।
बस, एक कौआ बैठा रहा
घर की अलगनी में
काँव-काँव करता
बच्चे को चिढ़ाता।

कौआ जानता है-
गुलेल से पत्थर फेंकने की
सम्पूर्ण प्रक्रिया,
शैतान बच्चे की
लक्ष्यवेधी क्षमता
और आपातकाल में
अपने बचाव के उपाय।

कबूतर जानते हैं-
भरपेट दाना चुगना,
गुटरगूँ-गुटरगूँ करना,
ऊँचे आकाश में उड़ान भरना
और तीव्र गति से फेंके गए
पत्थर से
आहत हो धरती पर गिर जाना,
इसके सिवा कुछ भी नहीं!

मासूम कबूतरों की मृत देहों के सहारे
परवान चढ़ी है
शैतान बच्चे की क्रूरता,
अब उसकी निगाह
फुर्र से उड़ जाने
वाले कबूतरों पर नहीं
कौए की चतुराई पर टिकी है।
बच्चा सीख रहा है
गुलेल को पीठ के पीछे
छुपाकर
अपने मासूम चेहरे को
मासूमियत से ढाँप
दुनियादार होने का पहला सबक़!

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Book by Nirmal Gupt:

निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . तीन व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में,हैंगर में टंगा एंगर और बतकही का लोकतंत्र प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : gupt.nirmal@gmail.com