फुलझड़ी

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

है बदन ज्यों चन्द्रमा
और थोड़ा काँच हो
रेत से लिपटे हो दोनों
और थोड़ी आँच हो
एक वृत फिर आतिशों का
बनता हो, जैसे एक परी
कर रही विचरण दृगों में
जग पूछता जिससे, अरी!
है अनल तू या जुगनुओं की लड़ी है?
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

है बदन ज्यों एक कलिका
सकुचायी हुई सी
भ्रमर के अतिरेक पर
भरमायी हुई सी
छूते ही जाए बिखर जो
और कुछ विस्तार कर
खुशबू को भीतर संभालें
ओस का शृंगार कर
पुष्प-पुंजों के मध्य रानी सी खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

चित्र श्रेय: कवर (वयं रक्षामः)


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पुनीत कुसुम
पुनीत कुसुम

कविताओं में खुद को ढूँढती एक इकाई..!

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