एक समस्या मुँह खोले खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

है बदन ज्यों चन्द्रमा
और थोड़ा काँच हो
रेत से लिपटे हो दोनों
और थोड़ी आँच हो
एक वृत फिर आतिशों का
बनता हो, जैसे एक परी
कर रही विचरण दृगों में
जग पूछता जिससे, अरी!
है अनल तू या जुगनुओं की लड़ी है?
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

है बदन ज्यों एक कलिका
सकुचायी हुई सी
भ्रमर के अतिरेक पर
भरमायी हुई सी
छूते ही जाए बिखर जो
और कुछ विस्तार कर
खुशबू को भीतर संभालें
ओस का शृंगार कर
पुष्प-पुंजों के मध्य रानी सी खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

एक समस्या मुँह खोले खड़ी है
वह फुलझड़ी है या फूलों से झड़ी है?

 

चित्र श्रेय: कवर (वयं रक्षामः)


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

5 Comments

  • Rohit Nag · October 30, 2016 at 5:37 pm

    What a way of writting….nice one

  • Chetan Bagaria · January 21, 2017 at 2:09 pm

    सर
    रख लो के इंतज़ार में।
    सत्यवती सांध्य से एक और फैन।

  • Deepika Sharma · September 4, 2017 at 2:38 am

    This is beautiful. Loved the play of words. Keep posting 🙂

      Puneet Kusum · September 4, 2017 at 2:53 am

      Thanks Deepika. You can now subscribe to receive future posts right there in your inbox 😛

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