उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति

पास नहीं हो इसीलिए न!
कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर
इतने सुन्दर दिख रहे हो आज!

विरह की छेनी से ठीक से
तराश-तराश कर
तमाम अनावश्यक
असुन्दरता
काट-छाँटकर
नाप-तौलकर
मिलन की अनन्य कला गढ़ देने-सा।

कोणार्क की बोलती
स्पन्दित उस शिलामूर्ति-सी
पहले नहीं देखी थी
विच्छेद की यह माधुर्यमय भव्यता।

मालूम जो नहीं था
अनन्त मिलन की यह
मुग्ध समाहित लगन
युग-युग बीतने पर भी
नहीं जाती
बीत नहीं जाती।

तेरे चले जाने से
मैं ज़रा भी व्यथित नहीं हूँ
चुन चुनकर तेरी चाहत के एकान्त को
देख, देख न!
तेरे अनन्य प्रतिरूप
अपने लिए बनाये हैं मैंने।

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