प्रेम ईश्वर

तुम्हें देखना है,
झाँकना बीते हुए वक़्त की आँखों में,
जिनकी नज़र पीठ पर होती है
मेरे पलटने से ऐन पहले तक

तुम्हें सुनना है,
सुबह के पहले पहर में सुनना भैरवी,
जिससे सारी संभावनाएँ खत्म सी हो जाएँ,
जीवन में किसी और राग के प्रवेश की

तुम्हें जानना है,
खड़े हो जाना सूर्य के ठीक सामने,
एक वर्ष तक,
निरन्तर चलते रहने के बाद भी

तुम्हें प्रेम करना है,
गिरते जाना एक अन्तहीन खाई में,
और अपने निम्नतम पड़ाव पर,
मिल जाना अपने स्वरूप से

तुम्हें पाना है,
एक बेढंगे पूर्वाग्रह से प्रेरित हो,
पा लेना एक दिन खुद को,
अपनी पूँछ का पीछा करते हुए

तुम्हें पाकर जान पाता हूँ कि,
तुम्हें पाने की यात्रा,
इससे कहीं ज़्यादा सुन्दर अनुभूति थी।