त्याग, समर्पण और यहाँ तक कि अनकंडीशनल लव भी प्रेम में पुरानी बातें हैं। और पुरानी इसलिए क्योंकि जब भी किसी ने इन शब्दों को इनके शाब्दिक अर्थों में ही साधना चाहा, हमेशा प्रेम हारा है। साथ ही हारा वह इंसान जिसने प्रेम किया था। और एक हारे हुए इंसान के लिए दोबारा प्रेम करना उतना ही मुश्किल है जितना शब्दों को एक नया अर्थ देना। यहाँ हमारी पसंदीदा सात प्रेम कविताएँ प्रस्तुत हैं। इनमें से प्रत्येक कविता प्रेम को एक नया रूप, एक नया अर्थ देती दिखायी देती है। अगर आप भी अपने लिए इनमें कुछ नया ढूँढ पाएँ तो प्रेम का यह उत्सव उतना भी निरर्थक नहीं लगेगा जितना इसको मात्र एक ‘चोचला’ कहकर बता दिया जाता है। – पोषम पा

‘प्रेम कविता’ – अंजू शर्मा

ये सच है
तमाम कोशिशों के बावजूद
कि मैंने नहीं लिखी है
एक भी प्रेम कविता

बस लिखा है
राशन के बिल के साथ
साथ बिताये
लम्हों का हिसाब,

लिखी हैं डायरी में
दवाइयों के साथ,
तमाम असहमतियों की
भी एक्सपायरी डेट

लिखे हैं कुछ मासूम झूठ
और कुछ सहमे हुए सच
एकाध बेईमानी
और बहुत सारे समझौते,

कब से कोशिश मैं हूँ
कि आंख बंद होते ही
सामने आये तुम्हारे चेहरे
से ध्यान हटा
लिख पाऊँ
मैं भी
एक अदद प्रेम कविता…

‘प्रेम कविता’ – बर्तोल ब्रेख्त (अशोक वाजपेयी द्वारा अनूदित)

मुझे एक पत्ती भेजो
जो उगी हो
किसी नन्हे वृक्ष पर

और जो तुम्हारे घर से
आधे घण्टे की दूरी से
कम पास न हो

तुम्हें चलना होगा
और तुम मज़बूत हो जाओगे
और मैं
उस सुन्दर पत्ती के लिए
तुम्हें धन्यवाद दूंगा।

‘एक प्रेम कविता का सच’ – लवली गोस्वामी

दुखों के कितने ही घाव जब एक साथ टीसते हैं
तब आँखों से अंजुरी भर खारा पानी बहता है

ढ़ाई ग़ज रेशम की चूनर कई इल्लियों की
जीवन भर की मेहनत का नतीजा है

फूलों की एक बड़ी माला में
पूरे बगीचे का वसंत कैद होता है

इसीलिए किसी कवि से कभी यह मत पूछना
कि वह फिर से प्रेम कविता कब लिखेगा

प्रेम की एक कविता ताल्लुक़ के
कई सालों का दस्तावेज़ है।

‘प्रेम कविता’ – गीत चतुर्वेदी

आत्महत्या का बेहतरीन तरीक़ा होता है
इच्छा की फ़िक्र किए बिना जीते चले जाना
पाँच हज़ार वर्ष से ज़्यादा हो चुकी है मेरी आयु
अदालत में अब तक लम्बित है मेरा मुक़दमा
सुनवाई के इंतज़ार से बड़ी सज़ा और क्या

बेतहाशा दुखती है कलाई के ऊपर एक नस
हृदय में उस कृत्य के लिए क्षमा उमड़ती है
जिसे मेरे अलावा बाक़ी सब ने अपराध मना

संविधान की क़िताब में इस पर कोई अनुच्छेद नहीं।

‘प्रेम’ – रश्मि भारद्वाज

सात समन्दर पार लाल परी के झोले में रखी
जादुई डिबिया में बन्द एक ख़ुशबू-सा प्रेम
डिबिया खोलते ही
छू !… हाथ कुछ भी नहीं
ग़ायब हो गई डिबिया भी
और तब होता है एहसास
यह कुछ और नहीं
है उनींदी आँखों का एक सपना भर

किसी अनाड़ी मछुआरे की तरह प्रतीक्षारत हम
निहारते हैं अनन्त विस्तार
तन मन के स्पन्दन को समेटे
सम्भावनाओं के नील जल में तलाशते जीवन के टुकड़े
लेकिन शाम तक लौट आते हैं वापस
उठाए खाली टोकरी क़िस्मत की
प्रेम छिपा होता है कहीं गहरे अतल में

वह जो एक अंश हम सा विचरता है ब्रह्माण्ड में
लाख बुलाओ उसे लौट आती है प्रतिध्वनि वापस
हम देते हैं दिलासा
जो मिला वही प्राप्य था
वही एक आवाज़ आनी थी हम तक
आवाज़ों के सघन जंगल को चीरती
बनकर मनचाही पुकार
जाने क्यों एक दिन फिर
आवाज़ के तलवों में उग आती हैं नुकीली कीलें
ठक-ठक रौंदी जाती हैं आत्मा
गुज़र जाता है कोई बन्द किए आँखें
छोड़ पीछे नीले-स्याह निशान
उसे भी तो बुलाया प्रेम ही हर बार

‘मौन की लय में गीत प्रेम का’ – बाबुषा कोहली

मैं स्पैनिश में कहती हूँ तुम हिब्रू में सुनते हो
हम ब्रेल में पढ़े जाते हैं

हम खितानी की तरह विलुप्त हो जाना चाहते थे
पर हर सभ्यता में कोई दरोग़ा होता है
मुझे हो-हल्ले में हथकड़ी डाल दी जाती है
तुम चुप्पियों में मारे जाते हो

मैं तुम्हारे कण्ठ में घुटी हुई एक सिसकी हूँ
तुम मेरे श्वास से कलप कर निकली हुई एक आह हो
रुलाई हमेशा बारहखड़ी के बाहर फूटती है
हूक की कोई व्याकरण नहीं होती

चमकते अलंकार मेरी आँखें फोड़ नहीं सकते
तुम्हारे मौन की पट्टी मैंने आँखों पर बाँध रखी है
हम आयतें हैं हम मन्त्र हैं हम श्लोक हैं
हम लगातार हर ज़ुबान में बुदबुदाए जा रहे हैं

मेरे प्यारे बहरे बीथोवन
मैं तुम्हारी रची हुई जादुई सिम्फ़नी हूँ

देखो ! ज़माना मुझको बड़े ग़ौर से सुन रहा है

‘अप्रेम’ – अनुराधा सिंह

तुम हर बार कितने भी अलग
नए चेहरे में आये मेरे पास
मैं पहचान लेती रही
विडम्बना यह थी कि
मैं तुममें का
प्रेम पहचानती रही
आह्लाद से आपा खोती रही हर बार
भूल भूल जाती रही
कि प्रेम तुम तब तक
और उतना ही कर पाओगे मुझसे
जब तक और जितनी मैं तुम्हारे अप्रेम में रहूंगी
मेरी माँ यह कठिन यंत्र सिखाना भूल गयी थीं मुझे
और उनकी माँ उन्हें
वे सब कच्ची जादूगर थीं
पहले ही जादू में अपनी पूरी ताकत झोंक देतीं थीं
उस पर कि
बस आधा जादू जानती थीं
अपने ही तिलिस्म में फँस कर
दम तोड़तीं रहीं
उन्हें उस मंतर का तोड़ तक नहीं मालूम था
जो पलट वार करता था
हालाँकि सीना पिरोना साफ़ सफाई और पकाने से ज़्यादा
अनिवार्य विषय था
अप्रेम में रहना सीखना और सिखाना
बहुत करीब से दूर तक जो पगडंडियाँ
सड़कें और पुल पुलिया देखती हूँ
जो तुमने बनाये हैं
किसी न किसी सदी तारीख या पहर
वे सब किसी न किसी जगह से बाहर
जाने के तरीके हैं
प्रेम से बाहर जाने का तरीका नहीं है इनमें से एक भी।

 

चित्र श्रेय: Lotte Meijer

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