प्रेम-प्रेमी

प्रेम लगाए लहू अधर पे
कुतर-कुतर प्रेमी को खाए,
माँस का टुकड़ा मिले दाँत में
आँख में मिले वियोग की हाय।

नयन से बहे नीर की धारा
प्रेम बेचारा सिसकत जाए,
भूख की हूक में बेबस होकर,
प्रेम आज प्रेमी को खाए।

नोच ना चमड़ी पीड़ा मत दे
चीख-चीख प्रेमी चिलाए,
भूख खा गई प्रेम ये सारा,
प्रेम खा गया प्रेमी हाय।

बैठा लहू के बाग़ में प्रेम
प्रेमी के माँस पे फूल खिलाए,
नस, आँत, पस्ली की सेज पर
नए प्रेमी की आस लगाए।

प्रेम लगाए लहू अधर पे
कुतर-कुतर प्रेमी को खाए।