कुटज

ललित निबन्ध: 'कुटज' - हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व…

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गेहूँ बनाम गुलाब

'गेहूँ बनाम गुलाब' - रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है,…

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धोखा

'धोखा' - प्रतापनारायण मिश्र इन दो अक्षरों में भी न जाने कितनी शक्ति है कि इनकी लपेट से बचना यदि…

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अशोक के फूल

'अशोक के फूल' - हजारी प्रसाद द्विवेदी अशोक के फिर फूल आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर…

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