माँ आकाश है!

'माँ आकाश है' - गिरिराज किशोर बाप जहाज का मास्टर था। माँ एक अफ़सर की बेटी। दोनों का संयोग विवाह में…

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जीना तो पड़ेगा

'जीना तो पड़ेगा' - अब्दुल बिस्मिल्लाह जून की चिलचिलाती हुई गर्मी और धुर दुपहरी का समय। दुहरे बदन और मझोले…

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पासंग

'पासंग' - मेहरुन्निसा परवेज़ आज सुबह से ही बड़ी उमस थी, हवा बन्द सी थी। पत्ते तक जरा नहीं हिल…

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अपत्‍नी

'अपत्‍नी' - ममता कालिया हम लोग अपने जूते समुद्र तट पर ही मैले कर चुके थे। जहाँ ऊंची-ऊंची सूखी रेत…

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दोपहर का भोजन

'दोपहर का भोजन' - अमरकांत सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच…

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बाल गुरु

'बाल गुरु' - मृदुला गर्ग लड़का तब चौथी कक्षा में पढ़ता था। इतिहास की क्लास चल रही थी। टीचर बोल…

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लाजवन्ती

'लाजवन्ती' - राजिन्दर सिंह बेदी (ए सखि ये लाजवंती के पौधे हैं, हाथ लगाते ही कुम्हला जातें हैं.) बँटवारा हुआ…

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भाभी

'भाभी' - इस्मत चुग़ताई भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से पंद्रह बरस की होगी। बढवार भी तो पूरी…

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वापसी

कहानी: 'वापसी' - उषा प्रियंवदा गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नजर दौड़ाई - दो बक्‍स, डोलची,…

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रेल की रात

'रेल की रात' - इलाचंद्र जोशी गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था।…

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भेड़िये

'भेड़िये' - भुवनेश्वर 'भेड़िया क्या है', खारू बंजारे ने कहा, 'मैं अकेला पनेठी से एक भेड़िया मार सकता हूँ।'.. मैंने…

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