‘प्यार मत करना’ – कुशाग्र अद्वैत

जिस शहर में
पुश्तैनी मकान हो
बाप की दुकान हो
गुज़रा हो बचपन
हुए तुम जवान हो
उस शहर में
प्यार मत करना

जिस शहर से
ले जानी पड़े बारात
बाँधनी पड़े पगड़ी
करनी पड़े नौकरी
उस शहर में
प्यार मत करना

जिस शहर के
दैरों में करनी हो
दुआ-बन्दगी
जिस शहर में
आगे गुज़रनी हो
तुम्हारी ज़िंदगी
उस शहर में
प्यार मत करना

जिस शहर में
माँ का अकेलापन
दूर करने को
पैदा करना हो बच्चा
जिस शहर में
ताउम्र दिखना हो अच्छा
उस शहर में
प्यार मत करना

जिस शहर में हो
रिश्तेदारी-नातेदारी
खरीदनी तरकारी
उस शहर में
रह कर भी,
कर सकते हो
चोरी-चकारी
खून-कतल
पाल सकते हो
नए शग़ल
खोल सकते हो
परचून की दुकान
बेच सकते हो
बनारसी पान
कुछ भी
कर सकते हो
यार मेरे,
उस शहर में
रह कर पर,
प्यार मत करना

करना हो
प्यार अगर
तब, गर्मियों में
नानी के घर जाना
पड़ोस में रहती होगी
कोई टोनी, प्रीति, स्वीटी
उसको कुल्फी खिलाना
उसके लिए गीत गाना
उस से ही दिल लगाना
दिल लगा के लौट आना

या फिर, यारों संग
किसी अजनबी तट पर
चले जाना
वहाँ रेतीली दुपहरी में
समंदर किनारे की ठैरा-ठैरी में
किसी फिरंगन की
मस्त मलंगन की
श्याम हुई* देह पर
बेहद सलीके से
उँगलियों की स्याही से
अपना नाम लिख आना;
एक चाँदनी रात में
नशे की हालत में
पश्चिमी तालों पर
उसके साथ पाँव थिरकाना;
और, उसके नर्म गालों पर
अपने काँपते होंठों की
बेक़रारी छोड़ आना

कुछ भी कर लेना
यार मेरे ,
पर, जिस शहर के
नीम-हकीम,
धोबी, दर्ज़ी,
पण्डित, पादरी,
मौलवी, काज़ी,
अब्बा के जाननेवाले हों,
जिस शहर के
मन्दिर, गिरजा,
घाट, सरोवर,
अरण्य, उपवन
अक्सर दिखनेवाले हों
उस शहर में
रह कर
तुम प्यार मत करना..

■■■

*यहाँ श्याम हुई का मतलब suntanned से है।

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