कुछ पंक्तियाँ/उद्धरण- ‘अपनी अपनी बीमारी’

“दया की भी शर्तें होती हैं।”

 

“चंदा माँगनेवाले और देने वाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेने वाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं।”

 

“चश्मदीद गवाह वह नहीं है जो देखे- बल्कि वह है जो कहे कि मैंने देखा।”

 

“जो देश का काम करता है, उसे थोड़ी बदतमीज़ी का हक़ है। देश-सेवा थोड़ी बदतमीज़ी के बिना शोभा ही नहीं देती। थोड़ी बेवकूफी भी मिली हो, तो और चमक आ जाती है।”

 

“मैं बीमारियों से कहता- तुम इतनी हो। कोई आ जाओ न! बीमारियाँ कहतीं- दवाओं के बढ़े दामों से हमें डर लगता है। जो लोग दवाओं में मुनाफाखोरी की निंदा करते हैं, वे समझें कि महँगी दवाओं से बीमारियाँ डरने लगी हैं। वे आती ही नहीं। मगर दवाएँ सस्ती हो जाएँ तो हर किसी की हिम्मत बीमार पड़ने की हो जाएगी। जो दवा में मुनाफाखोरी करते हैं वे देशवासियों को स्वस्थ रहना सीखा रहे हैं। मगर यह कृतघ्न समाज उनकी निंदा करता है।”

 

“पवित्रता का मुँह दूसरों की अपवित्रता के गंदे पानी से धुलने पर ही उजला होता है।”

 

“वारिस न हो तो जायदाद हाय-हाय करती रहती है कि मेरा क्या होगा? आदमी को आदमी नहीं चाहिए। जायदाद को आदमी चाहिए।”

 

“बाज़ार बढ़ रहा है। इस सड़क पर किताबों की एक नई दुकान खुली है और दवाओं की दो। ज्ञान और बीमारी का यही अनुपात है हमारे शहर में।”

 

“जिस सिगड़ी को जमीन पर रखकर तुम्हारी माँ रोटी बनाती है, उसे टेबिल पर रख दो, जिससे तुम्हारी पत्नी सीधी खड़ी होकर रोटी बना सके। 20-22 सालों में सिगड़ी ऊपर नहीं रखी जा सकी और न झाड़ू में चार फुट का डण्डा बांधा जा सका। अब तक तुम लोगों ने क्या खाक क्रांति की है?”

 

“हम पूरे मुँह से बोलते हैं, मगर बुद्धिवादी मुँह के बाएँ कोने को ज़रा-सा खोलकर गिनकर शब्द बाहर निकालता है। हम पूरा मुँह खोलकर हँसते हैं, बुद्धिवादी बायीं तरफ के होठों को थोड़ा खींचकर नाक की तरफ ले जाता है। होंठ के पास नथुने में थोड़ी हलचल पैदा होती है और हम पर कृपा के साथ यह संकेत मिलता है कि- आई एम एम्यूज़्ड! तुम हँस रहे हो, मगर मैं सिर्फ थोड़ा मनोरंजन अनुभव कर रहा था। गंवार हँसता है, बुद्धिवादी सिर्फ रंजित हो जाता है।”

 

“लोग कहते हैं कि आखिर स्थायी मूल्य और शाश्वत परम्परा भी तो कोई चीज़ है। सही है, पर मूर्खता के सिवाय कोई भी मान्यता शाश्वत नहीं है। मूर्खता अमर है। वह बार-बार मरकर फिर जीवित हो जाती है।”

 

“जो नहीं है, उसे खोज लेना शोधकर्ता का काम है। काम जिस तरह होना चाहिए, उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है। जिस बीमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने देकर दूसरी बीमारी से मार डालना डॉक्टर का काम है। अगर जनता सही रास्ते पर जा रही है, तो उसे गलत रास्ते पर ले जाना नेता का काम है। ऐसा पढ़ाना कि छात्र बाज़ार में सबसे अच्छे नोट्स की खोज में समर्थ हो जाए, प्रोफेसर का काम है।”

 

“सदियों से यह समाज लिखी पर चल रहा है। लिखाकर लाए हैं तो पीढ़ियाँ मैला ढो रही हैं और लिखाकर लाए हैं तो पीढ़ियाँ ऐशो-आराम भोग रही हैं। लिखी को मिटाने की कभी कोशिश ही नहीं हुई! दुनिया के कई समाजों ने लिखी को मिटा दिया। लिखी मिटती है! आसानी से नहीं मिटती तो लात मारकर मिटा दी जाती है। इधर कुछ लिखी मिट रही है। भूतपूर्व राजा-रानी की लिखी मिट गयी। अछूतों के लड़के पढ़-लिखकर अफसर भी होने लगे हैं और जिन विप्र परिवारों में उनका बाप सफाई करता है, उनके लड़के उसे झुककर सलाम करते हैं। जो लिखाकर लाए थे कि इनके हमेशा चरण छूए जाएंगे, उनकी भी लिखी मिट रही है।”

 

“हम दोनों साहब के कमरे में घुसे। एक निहायत बनावटी मुस्कान फैली साहब के चेहरे पर। यह मुस्कान सरकार खास तौर से अपने कूटनीतिज्ञों और अफसरों के लिए बनवाती है। पब्लिक सेक्टर में इसका कारखाना है। प्राइवेट सेक्टर के कारखाने में बनी मुस्कान व्यापारी के चेहरे पर होती है। इसे नकली मूँछ की तरह फौरन पहन लिया जाता है। जब ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के साथ मुस्कुराते सरदार स्वर्णसिंह की तस्वीर देखता तो चकित रह जाता। भारत-पाक युद्ध, भयंकर दुश्मनी- मगर मुस्कान यह ऊंची क्वालिटी की बनी हुई है।”

 

“डॉक्टर कहता है- ज़रा दिमाग को शांत रखिए। मैं सोचता हूँ- इस ज़माने में दिमाग तो सिर्फ सूअर का शांत रहता है।यहाँ-वहाँ का मैला खा लिया और दिमाग शांत रखा। जो ऐसा नहीं करता और जो सचेत प्राणी है, उसका दिमाग बिना मुर्दा हुए कैसे शांत रहेगा?”

 

“रिटायर्ड आदमी की बड़ी ट्रेजडी होती है। व्यस्त आदमी को अपना काम करने में जितनी अक्ल की ज़रूरत पड़ती है, उससे ज़्यादा अक्ल बेकार आदमी को समय काटने में लगती है। रिटायर्ड वृद्ध को समय काटना होता है। वह देखता है कि ज़िन्दगी भर मेरे कारण बहुत कुछ होता रहा है। पर अब मेरे कारण कुछ नहीं होता। वह जीवित सन्दर्भों से अपने को जोड़ना चाहता है, पर जोड़ नहीं पाता। वह देखता है कि मैं कोई हलचल पैदा नहीं कर पा रहा हूँ। छोटी सी तरंग भी मेरे कारण जीवन के इस समुद्र में नहीं उठ रही है। हमारे चाचा जब तब इस न कुछपन से त्रस्त होते, परिवार में लड़ाई करवा देते। खाना खाते-खाते चिल्लाते- दाल में क्या डाल दिया? कड़वी लगती है। मुझे मार डालोगे क्या? हम कहते- दाल तो बिलकुल ठीक है। वे कहते- तो क्या मैं झूठ बोलता हूँ! भगवान की कसम! परिवार में आपस में लड़ाई मच जाती। हम देखते कि हम लड़ रहे हैं, पर चाचा आराम से सो रहे हैं। तूफ़ान खड़ा कर देने में सफलता से उन्हें अपने अस्तित्व और अर्थ का बोध होता और मन को चैन मिलता।”


हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई (22 अगस्त, 1924 - 10 अगस्त, 1995) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा।

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