Puneet-
हे राधे, हे राधे
हे राधे, हे राधे
हे राधे, हे राधे
कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे

ऊपर नभ् को खोल खोल कर
धरती के भीतर टटोल कर
स्वर्ग, नरक और पातालों में
जीव-मरण के जंजालों में
मैंने तुझको कहाँ ना ढूँढा

गाँव, बस्ती, घर, आँगन में
पौह, चैत्र, कातक, फ़ागुन में
हर देहरी पर, हर एक पट पर
प्रेम में डूबे यमुना तट पर
मैंने तुझको कहाँ ना ढूँढा

भूल हुई क्या मुझे बता दे
क्यों है मुझसे रूठी
तुझ बिन सब लीलाएँ झूठी
है बंसी भी टूटी

सम्मुख मेरे शीघ्र तू आजा
जाने क्या कर जाऊँ
हूँ तो पालनहार, वियोग में
शिवा ना मैं बन जाऊँ
राधे, शिवा ना मैं बन जाऊँ।

हे राधे, हे राधे
हे राधे, हे राधे
हे राधे, हे राधे
कान्हा ढूँढ रहा तुझे राधे

Shiva-
मैं ताक रही थी राह तुम्हारी
मोहन तुम नहीं आए
उजले नैनन रैन घिरी कारी
मोहन तुम नहीं आए

पायल टूटी, कजरा रूठा
चूड़ी-खनक का साथ भी छूटा
अँसुअन भीगी मोरी सारी
हर पाती ढूँढा हर डारी
मोहन तुम नहीं आए

जो हसी-ठिठोली करते हो
तुम दूजी हर बृजबाला से
खो जाओ जमना के तीरे
किन्ही नैनों में मधुशाला से

कभी फोड़ मटकियाँ कंकड़ से
कभी चीर चुरा शाखों पे धरो
कभी वन वन घूमो ग्वालों संग
कभी बालाओं संग रास करो

कोई शीश धरे, कोई बात करे
कोई प्रश्नों से आघात करे
और राधा सुबह-साँझ तके
तुम्हे याद साँझ से रात करे

हाय कैसी प्रेम की बेला वो
कैसी अँसुअन की साझेदारी
अधर थके जप कृष्ण नाम
और पलकें हुईं थकान से भारी
पर मोहन तुम नही आए

Puneet-
व्याकुल मन है
व्याकुल मन है
राधे मेरी, व्याकुल मन है

शिकवे जो हैं ह्रदय बसे
सम्मुख आकर भी कर सकतीं
प्रीती रोष जिससे चाहो
मेरा प्रेम पिटारा भर सकतीं
संशय के बाद समन्वय हो
हाँ यही प्रेम का यौवन है
व्याकुल मन है

जिस राह मुझे तुम ढूँढ रही
उस राह पे मैं इस ओर खड़ा
जिन नैनों में रैना है घिरी
उन नैनों में काजल सा पड़ा

पायल, कजरा, चूड़ी, सारी
जो चाहो तुम बन जाऊँगा
मैं पात पात, मैं फूल फूल
मैं शाख शाख तन जाऊँगा

उस हसी ठिठोली में राधे
अधर हूँ मैं, मुस्कान हो तुम
मैं यमुना में बहती तृष्णा हूँ
अरे नैनों का मधुपान हो तुम

वो मटकी तुम, वो कंकड़ मैं
मैं आकर लग जाता तुमको
जो चीर चुरा शाखों पे रखे
अरे उनमें भी पाता तुमको

ग्वाला, बालाएँ, वन, गईया
सबका मैं उत्तरदायी हूँ
हर तत्व मुझे ही खोज रहा
मैं ही तो केंद्र इकाई हूँ

कैसे बिसरा दूँ इन सबको
और प्रेम में सहसा खो जाऊँ
कर्म-धर्मं को भूलके मैं
कैसे मानव सा हो जाऊँ

समझो राधे, कुछ तो समझो
किस भाषा में बतलाऊँ मैं
संसार सकल जो पा भी लूँ
तुमको खोकर क्या पाऊँ मैं
जो साक्ष्य बने तेरे अश्रु का
अरे हाय, निरर्थक जीवन है
व्याकुल मन है।

Shiva-
हे धर्मनिष्ठ, हे कर्मवीर!
मैं अज्ञानी, मूरख, अधीर

तुम सूरज की पहली लौ से
चाँदनिया के बिखर जाने तक
पहरों, पक्षों, हर वासर के
उगने और फिर झर जाने तक

पुरवाई की शोखी तुम
मौसम की अंगड़ाई भी तुम ही
हर मनुष्य के भीतर तुम
सह-चालक परछाईं भी तुम ही

मैं भूल गयी!
मैं भूल गयी खुद ईश्वर से
लगा बैठी हूँ दिल मोहन
तुम दिनकर हो, मैं एक भ्रमर
क्या करूँ जो पाऊँ मिल मोहन

मैं भूल गयी बिन मांझी ही
ले नौका मैं मझधार गयी
एक भक्त तो तृप्त हुई मोहन
एक प्रेयसी पर हार गयी

मैं भूल गयी हर औरत का
सम्मान सहेजा जाएगा
इस प्रेम मे ज्वर प्रश्नों का
केवल मेरे भाग ही आएगा

मैं भूल गयी संतापों को
सहना है, एकल रहना है
तुम्हे ब्याह-सूत्र मे बँधते भी
देखूं तो चुप ही रहना है

मैं भूल गयी बस लीला रस
तक सीमित यह संबंध रहे
कोई हक़, चाहत, कोई नाम नहीं
अश्रुओं का बस अनुबँध रहे

मैं भूल गयी!

Puneet-
यह प्रेम नहीं
यह प्रेम नहीं
यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं

जब सूरज चढ़ता है नभ् में
हर ओर उजाला करता है
खोलकर झालर सी किरणें
हर दिशा में झर-झर झरता है
वह प्रेम नहीं जो सूरज को
बस पूरब से जोड़े रखे
जो प्रीतम की हर एक नज़र
बस प्रेयसी तक मोड़े रखे
यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं

हो चाँद, वृक्ष या फिर मनु का
अन्तर्मन हो, परछाईं हो
सन सन करती पुरवाई हो
या मौसम की अंगड़ाई हो
वह प्रेम नहीं जो इन सबको
सीमाओं में बाँधे रखे
भूल के जो सारे जग को
बस मन की हठ साधे रखे
यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं

सम्मोहन की चादर में
भीतर सोया है स्वार्थ वहीँ
कुंठित होकर जो खोजोगी
तो मिले न मेरा कण भी कहीं
क्यों मानव बन, तुम मानव की
आँखों से मुझको देख रहीं
मन की आँखों से देखो और
मुझको पा लो हर बार यहीं

भावुकता की सरिता में
बहती जाती हो तुम राधे
स्वयं रचित संतापों को
सहती जाती हो तुम राधे
क्यों प्रेम भूलकर, प्रेम में तुम
बस तुलना करती जाती हो
स्नेह त्याग क्यों आँचल में
आवेग को भरती जाती हो
जहाँ प्रीत का निर्मल निर्झर था
वहाँ शंका की ज्वाला है बही
यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं
यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं, यह प्रेम नहीं

Shiva-
मैं मान तो लूँ कि प्रेम रश्मियाँ
पूरब की जागीर नहीं
मैं स्मरण रखूँ की प्रेम अनल
बहती शीतल समीर नहीं

मैं विष्णु का अवतार नहीं
मुझसे चलता संसार नहीं
पर क्षमा करो, जो बात कहो
वह होती मन के पार नहीं

हाँ नभ के हर नक्षत्र में नैन
मेरे देखो, यह चाहत ना!
जो कहो कहन उस कहने में
बस मुझे कहो, यह चाहत ना!
पट कर्णों के खट खट जो सुनें
बस मुझसे सुनें, यह चाहत ना!
हर पग धर डगर जो कृष्ण चलो
बस मुझसे मिले, यह चाहत ना!

पर प्रेम ग़लत है वह भी तो
की हर क्षण ही दम घुटता हो
क्यूँ खोल साँकलें मान बैठे
जिस नगर मे हर घर लूटता हो!

तुम धर्म के संस्थापन के लिए
छल भी कर सकते हो मोहन
मैं न्याय प्रेम का माँगूँ तो
मेरा स्वार्थ वहीं दिख जाता है
सुन क्रंदन हर पर-स्त्री का तुम
भागे भागे जाते मोहन
मैं अपना दर्द बताऊं तो
उसका हठ से क्या नाता है?

पृथ्वी के उद्धार को तुम
सौ बार जनम लेते मोहन
और प्रेम मे कोई कर्तव्य नही
यह कौन ग्रंथ सिखलता है?

जब हाथ पकड़, सिर काँधे धर
कोई प्रेम कथा कही जाती है
उस राह पे फिर बस हँसी नहीं
हर पीर साथ सही जाती है

जुड़ जाता है दायित्वों मे
यह प्रेम नाम का दीपक भी
हर लौ को बचाना पड़ता है
यहाँ हर पल आँधी आती है

माना कर्तव्य में जकड़ अनसुनी
तुम राधा की पुकार करो
सम्बन्ध सम्भल जो पाए नहीं
क्यूँ कर ऐसा फिर प्यार करो?

स्वीकार नहीं यह प्रेम मुझे
तुम्हे दिखे मेरा ही स्वार्थ भले
कि कर्तव्यों की अग्नि मे
राधा का निश्च्छल प्रेम जले

है निर्णय केवल
मेरा यही
यह प्रेम नहीं
तो ना ही सही-(2)

Puneet-
हाय सरलता से कितनी
यह प्रश्न है तुमने कर डाला
जैसे कृष्ण का तन ही नहीं
सम्भव है मन भी हो काला

यदि मूक रहूँ मैं जो अब भी
सूचित हो, वह अनुचित होगा
बंद अधरों की परिधि में
अथाह प्रेम सीमित होगा

तो सुन लो अब जो कहता हूँ
राधे तुमसे क्या नाता है
बंद करो अपनी आँखें और
देखो भविष्य कहाँ जाता है

तुम देख रही हो ना राधे
क्रूर कंस की करनी को
कारागार में मथुरा के
क़ैद पिता और जननी को

तुम देख रही हो ना राधे
कैसे अर्जुन घबराया है
खोकर सम्पूर्ण मनोबल को
केवल मुझको ही पाया है

तुम देख रही हो ना राधे
अपमान द्रौपदी का बोलो
तुला में उसकी चीख धरो
मोह से अपने फिर तोलो

तुम देख रही हो ना राधे
सुदामा के पाँव के वो काँटे
जो करूँ अनसुनी मैं भी फिर
वो अपनी पीड़ किस्से बाँटे

जो संग तेरे राधा मैं रहा
फिर प्रेम न आड़े आए कहीं
धर्म की संरक्षा हेतु
मेरा वचन व्यर्थ न जाए कहीं

किन्तु यह भी याद रहे
मेरे प्राणों में तुम बस्ती हो
मेरे अश्रु में क्रन्दन तेरा
मेरी मुस्कानों में हँसती हो

परिणय में बंध भी जाऊँ
मैं चाहे लाख हजारों से
ह्रदय के भीतर राधे
कोई ना दूजा आएगा
राम के संग ज्यों सीता है
और शंकर के संग गौरा है
कान्हा के संग, हे राधे
बस तुमको पूजा जाएगा
कान्हा के संग, हे राधे
बस तुमको पूजा जाएगा
बस तुमको पूजा जाएगा

Shiva-
माना है मार्ग कठिन मोहन
कर्तव्यों ने तुम्हें उलझाया
माना मन कोठर के भीतर
बैठा है प्रेम भी अकुलाया

पर मोहन जो अवतरण तुम्हारा
हुआ है बस दुनिया के लिए
तो क्यूँ राधा से मन जोड़ा
क्यूँ खोखले से वादे किए

जो कर लूँ आज मैं समझौता
मन की देहरी पर झुक जाऊँ
सम्भव है फिर हर नारी रुके
जिस राह आज मैं रुक जाऊँ

यूँ ना हो जग के कर्मों का
करता धर्ता हो जाए पुरुष
औरत रह जाए एक सीढ़ी
जिस पर चढ़ निज हरषाए पुरुष

यूँ ना हो मेरा उदाहरण दे
माँगा जाए हर स्त्री से त्याग
कभी तैरे सपने सागर में
कभी अरमानों को लगे आग

यूँ ना हो हर औरत राधे सी
त्याग की मूरत बन जाए
और आदमी रहे आदमी
एक अक्स ना कृष्ण का मिल पाए

यूँ ना हो प्रेम अधूरा ये
आदर्श समझ लिया जाए
कोई पारदर्शी आड़ ले
कर्तव्य भंग किया जाए

जिस प्रेम मे तुम यह कहते हो
कि पूजनीय हो जाऊँगी मैं
उस प्रेम को ज़रा भी समझ सको
तो जानो कुछ ना पाऊँगी मैं

जब बंसी की धुन में खोई
तो माँगा ताल मैं बन जाऊँ
देखा गोवर्धन उंगली पर
तो चाहा खुद वहाँ तन जाऊँ

इक साथ तुम्हारा माँगा है
दूजा कुछ भी स्वीकार नहीं
या सुख दुख बाँटो, साथ रहो
या जुड़ा रहे कोई तार नहीं

कोई लीला प्रेम की होगी ना
एक भक्त से मिलने आना फिर
मैं भी मीरा हो जाऊंगी
निश्चिन्त हो धर्म निभाना फिर
निश्चिन्त हो धर्म निभाना फिर!!

Puneet-
अब शब्दों से मैं खाली हूँ
और मौन भी मेरे लज्जित हैं
मेरी हार के फूल प्रिय
तेरे चरणों पर अर्पित हैं
भूल हुई जो यूँ सोचा
कि मैं ही प्रेम पुजारी हूँ
और मैं ही प्रेम का रक्षक हूँ
नतमस्तक हूँ
राधे मेरी
सम्मुख तेरे
नतमस्तक हूँ

व्यर्थ है अब कुछ भी कहना
तुमने सब कुछ ही बोल दिया
प्रेम की परतों में निहित
बोध-पृष्ठ वो खोल दिया

कोई नाम नहीं, पूजन भी नहीं
तुमको मैं प्रेम सकल दूँगा
लेता हूँ इस पहर वचन
कि मैं इतिहास बदल दूँगा

अब वो होना निश्चित है
जिसकी भी आस करोगी तुम
मठ और मन्दिर से पहले
मेरे घर में वास करोगी तुम

गन्धर्व विवाह की आड़ नहीं
सामाजिक कोई दीवार नहीं
तुम प्रेयसि हो, मैं प्रीतम हूँ
कोई देव नहीं, अवतार नहीं

जिस रूप में मुझको चाहोगी
उस रूप में मुझको पाओगी
जो मैं एक राजा बन जाऊँ
तुम ही रानी कहलाओगी

सुन लो सब जन, यह घोषित है
कि धर्म है सूरज का जलना
वह धर्म निभाता जाएगा
पर घटा जो ढांपे शीतल सी
तो फिर पल में बुझ जाएगा

धर्म पेड़ का है बढ़ना
वह धर्म निभाता जाएगा
पर पतझर से जब प्रेम किया
तो वर्क वर्क झर जाएगा

धर्मं का है चन्दा का अम्बर
वह धर्म निभाता जाएगा
पर नदिया से जो प्रेम किया
तो तार-तार घुल जाएगा

धर्मं है कान्हा का पालन
वह धर्मं निभाता जाएगा
पर सम्मुख जब भी राधा हो
वह पहले प्रेम निभाएगा
वह पहले प्रेम निभाएगा..

 

चित्र श्रेय: शिवा 

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