रमेश पठानिया की कविताएँ

परिचय (रमेश जी के ही शब्दों में):  लिखना, अस्सी के दशक में शुरू किया, कविता, कहानी, और समाचार पत्रों के लिए लेख और कुछ संपादकीय, उत्तरी भारत के हिंदी समाचार पत्रों में लेखन जारी रहा। कविता लिखता रहा। हाँ हिंदी भाषी प्रदेश का न होने से प्रकाशक नहीं मिले, और जो मिले उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। कुछ एक महानुभावों को कविताएं दिखाईं तो उन्होंने तरह-तरह की टिप्पणी की और कुछ ने मेरे जाते ही, टाइप की हुई कविताओं के पन्ने कूड़े के डिब्बे में फ़ेंक दिए। आज का ज़माना बिलकुल अलग है, लोगों की विचारधारा थोड़ी तो बदली है, अपनी कविताओं को किसी भी प्लेटफार्म पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

कविता लेखन जारी रखा, मेरे भीतर जब भी कुछ टूटता रहा, जुड़ता रहा, बनता रहा, बिगड़ता रहा.. लिखता रहा।

इन्हीं राहों पर

photo by ramesh pathania
Photo: Ramesh Pathania

इन्हीं राहों पर
नदी के इस छोर से
पानी में लंबी होती परच्छाईयों
को निहारा करते थे पास बैठे,
तुमने उस घास के तिनके से कितनी बार
गीली ज़मीन पर कुछ लिखा
और फिर मिटा दिया
पानी की एक लहर आने से पहले ही
हमारे बीच की दूरियाँ भी
परच्छाईयों सी लंबी होने लगी
कुछ एहसास मिट्टी में पड़े,
कभी सूख जाते हैं,
कभी गीले हो जाते हैं…
कल फिर उस छोर तक होकर आया हूँ
नंगे पाँव…
उस गीली मिट्टी को,
मुट्ठियों में भींच कर देखा
तुम्हारे यूँ ही नदी के आस-पास
होने का एहसास हुआ,
दूर मंदिर से आती शंख ध्वनि
ने धीरे से कुछ कहा…
कल नयी सुबह होगी,
पानी का रुख़ भी बदलेगा…

कुछ कांच टूटे

कुछ कांच टूटे
कुछ शब्द रूठे
कुछ हुई
हवा बेवफा…
कुछ नींद बिखरी
कुछ स्वपन टूटे
राग बिगड़े…
वृक्ष उखड़े…
……….
भंवर …मन हुआ
चक्रवात तन हुआ
मझधार में
अटकी सांसे…
ऊधड़े स्वेटर सा
जीवन हुआ!

तुम्हे याद है क्या

तुम्हे याद है क्या
जब रेलगाड़ी
के डिब्बों की खिड़कियां
लकड़ी की बनती थीं
उन्हें शटर …
की तरह ऊपर नीचे
करते थे
कैसे हम झगड़ते थे
तुम खिड़की की तरफ ही
बैठना चाहती थीं…
रेलगाड़ी न जाने कितने स्टेशनों से
चुपके से
कभी बता कर गुज़र जाती थी
मैं जब भी खिड़की की तरफ बैठता था
बाहर ज़रूर देखता था….
स्टीम इंजन…
से उड़ते…
कोयले के कण…
आँखों में गिर जाते थे
तुमने कितनी बार
मेरी आँखों से दुपट्टे के कोने को
गीला कर
वह कण निकाले थे
तब तुम मेरे बहुत करीब आ जाती थीं…
और मैं झूठ कहता था
नहीं निकला…
ताकी तुम और करीब रह सको
आज अरसे बाद रेलगाड़ी में हूँ
साथ की सीट खाली है
मैं खिड़की की तरफ बैठा हूँ
स्टीम इंजन नहीं है
आँखों में न कोयले के कण हैं
न तुम हो ………….पास

बारिश की बूंदे गिरी और

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Photo: Ramesh Pathania

बारिश की बूंदे गिरी और
थम गयी
पहाड़ की चरागाह पे डंगरे (मवेशी) चराते,
सारे बच्चे चिल्लाने लगे,
सबको इन्द्रधनुष के सपनें याद आने लगे
कुछ पत्थर पे जा कूदे,
कुछ जोर से गाने लगे,
सूरज की रोशिनी बादलों से निकली,
इंद्रधनुषी उम्मीदें जगाने लगी।
… बच्चों के शोर से
भगवान का दिल पसीज गया,
दूर इक छोर पे,
इन्द्रधनुष उग गया,
पलक झपकते सपने सतरंगी हो गए
सारे बच्चे चिल्लाते-चिल्लाते विस्मय से शांत हो गए
सबकी आँखों में खुशियाँ छलक गयी
चीड़ के पेड़ों की सुई नुमा पत्तियों पे
पारदर्शी बूंदे ठहर गयी।
प्रकृति को समझना इतना मुश्किल नहीं
तो इतना आसान भी नहीं

तेरा हाथ थामे उन पगडण्डियों पर

तेरा हाथ थामे उन पगडण्डियों पर
चीड़ देवदार के पेड़ों की
ढलानों तले
लुक्का छिप्पी खेलते
सूरज की रोशनी में नहायी
तुम्हारी सुनहरी ज़ुल्फ़ों को बिना छुए
ताकते रहने का मकसद
कुछ और था।
बिना बात किये तुमसे बात करने का
मतलब कुछ और था
तुम्हारी आँखों में समाये मेरे प्रतिबिम्ब का
मतलब कुछ और ही था
तेरा हाथ अब भी मेरे हाथ में था
हाथों की भाषा समझना इतना मुश्किल भी नहीं
इस बार इन हाथों की भाषा का
मतलब कुछ और ही था..

थमीं भी नहीं

थमीं भी नहीं
रुकी भी नहीं
हां धीमी सी हो गयी ज़िन्दगी
हाथों से जैसे पतंग की डोर छूटने का एहसास
रेल के डिब्बों का
एक-एक कर गुजर जाना हो जैसे
और फिर अंतिम डिब्बे का
आँखों से ओझल हो जाना
…नदी तक होकर आया हूँ
खुद के आंसुओं को ..
खुद से छुपा कर…
……..
सर्दियां …लगभग खत्म होने को हैं
तुम्हारी यादों से…
पहाड़ बर्फ से लदे रहेंगे…
परत दर परत बर्फ
पिघलेगी..
यादें कहाँ फना होंगी….
बसंत ही एक उम्मीद है…
वादी को महकायेगा….
..

नदी सी बहती रही,

नदी सी बहती रही,
कविता थी,
हर लाइन में कुछ कहती रही,
तुम्हारी आँखों से गिरे आसुओं के किस्से,
गालों पर बेतरतीब काजल की लकीर,
कुछ कहती रही,
नदी सी बहती रही,
बातें ज़ुबान पर आने से पहले ही,
रुक गयी,
आँखें बहुत कुछ अनकहा कह गयी,
खामोशी में
और खामोशी थी,
जो तुमने नहीं कहा,
पास से गुज़री हवा वो सब कह गयी,
नदी सी बहती रही,
कविता थी,
हर लाइन में कुछ कहती रही..

अब पहाड़ नहीं चिन्ते सपनों के घर

photo by ramesh pathania (2)
Photo: Ramesh Pathania

अब पहाड़ नहीं चिन्ते सपनों के घर,
बस मकान बनाते हैं,
मुंडेर नहीं दिखती कई बार,
स्लेट नहीं छत पर,
सिर्फ कंक्रीट से सजाते हैं,
अब पहाड़ नहीं चिन्ते सपनों के घर
बस मकान बनाते हैं..

बड़ा बिचित्र सा है यह रिश्ता

बड़ा बिचित्र सा है यह रिश्ता
इसका नाम भी नहीं है कोई
इमली सा खट्टा-मीठा है
और गाँव से आये ताज़ा गुड़ सा स्वाद
कोई लेन – देन का झंझट भी नहीं
और वादों इरादों की
कोई लम्बी लिस्ट भी नहीं
बस नाराज़ होने का हक़ है
तुम से, खुद से, सारे जहान से
अक्सर सोचता हूँ
और देखता हूँ
अमरबेल को
जो दीवार से चिपकी रहती है
उसे दीवार का रूखापन
नहीं लगता बुरा कभी
हाँ तुमसे नाराज़ होकर
अच्छा नहीं लगता
कुछ भी

स्वार्थी हैं तो रिश्ते होंगे

स्वार्थी हैं तो रिश्ते होंगे
रिश्ते हैं तो स्वार्थी होंगे
महीन सी लकीर है
दोनों के बीच
पैसे हैं तो अमीर होंगे
रिश्ते नही हैं
तो गरीब होंगे

हर पूरनमाशी

हर पूरनमाशी
पर…अक्सर
पीपल के तने पर
मौली बांधता था..
फिर दोनों ने…
उसी तने पर
मौली बांधी….
पीपल की परिक्रमा भी की
तुमने तो पेरिस के उस पुल पर
ताला भी लगाया
और चाबी नदी में फेंक दी…
सैकड़ों तालों में वो “जन्दा” मुझे
मिला ही नहीं..
…………….
एक सदी बीत गयी मानो…
मेरी कलाई पर हमेशा
मौली रहती है…
तुम्हारी कलाई…
न जाने..
किसी और हाथ में है…

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