हरिशंकर परसाई सदियों पुराने मिथकों में अपनी कल्पना जोड़कर उसे आज के समाज की विसंगतियों का रूप दे देने के लिए जाने जाते हैं, चाहे वो कृष्ण-सुदामा मिलन का प्रसंग हो या फिर त्रिशंकु की कहानी। उनके पात्र अक्सर सपने में या फिर सच में ही पाताल और स्वर्ग का भ्रमण करते पाए जाते हैं। ‘अपनी-अपनी बीमारी’ किताब से लिए गए इस व्यंग्य ‘रामकथा क्षेपक’ में परसाई ने राम के अयोध्या लौटने के प्रसंग को और हनुमान के संजीवनी लेकर आने की घटना को बड़े ही रोचक ढंग से आधुनिक युग के विभिन्न वर्गों के भ्रष्टाचार से जोड़कर दिखाया है। हंसी-मजाक में ही इतना तीखा व्यंग्य परसाई की कलम से ही उभर सकता है। किताब ‘अपनी-अपनी बीमारी’ पर आगे की पोस्ट में लिखने का प्रयत्न करेंगे, अभी इस व्यंग्य को पढ़िए। – पोषम पा

‘रामकथा क्षेपक’

एक पुरानी पोथी में मुझे ये दो प्रसंग मिले हैं। भक्तों के हितार्थ दे रहा हूँ। इन्हें पढ़कर राम और हनुमान भक्तों के ह्रदय गदगद हो जाएंगे। पोथी का नाम नहीं बताऊंगा क्योंकि चुपचाप पोथी पर रिसर्च करके मुझे पी-एच.डी. लेनी है। पुराने ज़माने में लिखे दस पन्ने भी किसी को मिल जाएं तो उसे मजे में उनकी व्याख्या से डॉक्टरेट मिल जाती है। इस पोथी में 40 पन्ने हैं- याने चार डॉक्टरेटों की सामग्री है। इस पोथी से रामकथा के अध्ययन में एक नया अध्याय जुड़ता है। डॉ. कामिल बुल्के भी इससे फायदा उठा सकते हैं।

(1) प्रथम साम्यवादी

पोथी में लिखा है-

जिस दिन राम रावण को परास्त करके अयोध्या आए, सारा नगर दीपों से जगमगा उठा। यह दीपावली पर्व अनंत काल तक मनाया जाएगा। पर इसी पर्व पर व्यापारी खाता-बही बदलते हैं और खाता-बही लाल कपड़े में बाँधी जाती है।

प्रश्न है- राम के अयोध्या आगमन से खाता-बही बदलने का क्या सम्बन्ध? और खाता-बही लाल कपड़े में ही क्यों बाँधी जाती है?

बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गयी। वे कहने लगे- सेठजी, अब बड़ी आफत है। शत्रुघ्न के राज में तो पोल चल गयी। पर राम मर्यादा-पुरुषोत्तम हैं। वे सेल्स टैक्स और इनकम टैक्स की चोरी बरदाश्त नहीं करेंगे। वे अपने खाता-बही की जांच कराएंगे और अपने को सज़ा होगी।

एक व्यापारी ने कहा- भैया, तब तो अपना नंबर दो का मामला भी पकड़ लिया जाएगा।

अयोध्या के नर-नारी तो राम के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, मगर व्यापारी वर्ग घबड़ा रहा था।

अयोध्या पहुँचने के पहले ही राम को मालूम हो गया था कि उधर बड़ी पोल है। उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा- सुनो पवनसुत, युद्ध तो हम जीत गए लंका में, पर अयोध्या में हमें रावण से बड़े शत्रु का सामना करना पड़ेगा- वह है, व्यापारी वर्ग का भ्रष्टाचार। बड़े-बड़े वीर व्यापारी के सामने परास्त हो जाते हैं। तुम अतुलित बल-बुद्धि-निधान हो। मैं तुम्हें ‘एनफोर्समेंट ब्रांच’ का डायरेक्टर नियुक्त करता हूँ। तुम अयोध्या पहुँच कर व्यापारियों की खाता-बहियों की जांच करो और झूठे हिसाब पकड़ो। सख्त से सख्त सज़ा दो।

इधर व्यापारियों में हड़कंप मच गया। कहने लगे- अरे भैया, अब तो मरे। हनुमानजी एनफोर्स ब्रांच के डायरेक्टर नियुक्त हो गए। बड़े कठोर आदमी हैं। शादी-ब्याह नहीं किया। न बाल, न बच्चे। घूस भी नहीं चलेगी।

व्यापारियों के कानूनी सलाहकार बैठकर विचार करने लगे। उन्होंने तय किया कि खाता-बही बदल देना चाहिए। सारे राज्य में ‘चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स’ की तरफ से आदेश चला गया कि ऐन दीपोत्सव पर खाता-बही बदल दिए जाएं।

फिर भी व्यापारी वर्ग निश्चिन्त नहीं हुआ। हनुमान को धोखा देना आसान बात नहीं थी। वे अलौकिक बुद्धि संपन्न थे। उन्हें खुश कैसे किया जाए? चर्चा चल पड़ी-

-कुछ मुट्ठी गर्म करने से काम नहीं चलेगा?

-वे एक पैसा नहीं लेते।

-वे न लें, पर मेम साब?

-उनकी मेम साब ही नहीं हैं। साहब ने ‘मैरिज’ नहीं की। जवानी लड़ाई में काट दी।

-कुछ और तो शौक होंगे? दारू और बाकी सब कुछ?

-वे बाल ब्रह्मचारी हैं। कॉल गर्ल को मारकर भगा देंगे। कोई नशा नहीं करते। संयमी आदमी हैं।

-तो क्या करें?

-तुम्हीं बताओ, क्या करें?

किसी सयाने वकील ने सलाह दी- देखो, जो जितना बड़ा होता है, वह उतना, ही चापलूसी-पसंद होता है। हनुमान की कोई माया नहीं है। वे सिन्दूर शरीर पर लपेटते हैं और लाल लंगोट पहनते हैं। वे सर्वहारा हैं और सर्वहारा के नेता। उन्हें खुश करना आसान है। व्यापारी खाता-बही लाल कपड़े में बाँध कर रखें।

रातो-रात खाते बदले गए और खाता-बहियों को लाल कपड़े में बांधा गया।

अयोध्या जगमगा उठी। राम-सीता-लक्ष्मण की आरती उतारी गयी। व्यापारी वर्ग ने भी खुलकर स्वागत किया। वे हनुमान को घेरे हुए उनकी जय भी बोलते रहे।

दूसरे दिन हनुमान कुछ दरोगाओं को लेकर अयोध्या के बाज़ार में निकल पड़े।

पहले व्यापारी के पास गए। बोले- खाता-बही निकालो। जांच होगी।

व्यापारी ने लाल बस्ता निकालकर आगे रख दिया। हनुमान ने देखा- लंगोट का और बस्ते का कपड़े एक है। खुश हुए।

बोले- मेरे लंगोट के कपड़े में खाता-बही बांधते हो?

व्यापारी ने कहा- हाँ, बल-बुद्धि निधान, हम आपके भक्त हैं। आपकी पूजा करते हैं। आपके निशान को अपना निशान मानते हैं।

हनुमान गदगद हो गए।

व्यापारी ने कहा- बस्ता खोलूं? हिसाब की जांच कर लीजिए।

हनुमान ने कहा- रहने दो। मेरा भक्त बेईमान नहीं हो सकता।

हनुमान जहाँ भी जाते, लाल लंगोट के कपड़े में बंधे खाता-बही देखते। वे बहुत खुश हुए। उन्होंने किसी हिसाब की जांच नहीं की।

रामचंद्र को रिपोर्ट दी कि अयोध्या के व्यापारी बड़े ईमानदार हैं। उनके हिसाब बिलकुल ठीक हैं।

हनुमान विश्व के प्रथम साम्यवादी थे। वे सर्वहारा के नेता थे। उन्हीं का लाल रंग आज के साम्यवादियों ने लिया है।

पर सर्वहारा के नेता को सावधान रहना चाहिए कि उसके लंगोट से बूर्जुआ अपने खाता-बही न बाँध लें।

(2) प्रथम स्मगलर

लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति से घायल पड़े थे। हनुमान उनकी प्राण-रक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश से ‘संजीवनी’ नाम की दवा लेकर लौट रहे थे कि अयोध्या के नाके पर पकड़ लिए गए। पकड़ने वाले नाकेदार को पीटकर हनुमान ने लिटा दिया। राजधानी में हल्ला हो गया कि बड़ा बलशाली ‘स्मगलर’ आया हुआ है। पूरा फोर्स भी उसका मुकाबला नहीं कर पा रहा।

आखिर भरत और शत्रुघ्न आए। अपने आराध्य रामचंद्र के भाइयों को देखकर हनुमान दब गए। शत्रुघ्न ने कहा- इन स्मगलरों के मारे हमारी नाक में दम है, भैया। आप तो संन्यास लेकर बैठ गए हैं। मुझे भुगतना पड़ता है।

भरत ने हनुमान से पूछा- कहाँ से आ रहे हो?

हनुमान- हिमाचल प्रदेश से।

-क्या है तुम्हारे पास? सोने के बिस्किट, गांजा, अफीम?

-दवा है।

शत्रुघ्न ने कहा- अच्छा, दवाइयों की स्मगलिंग चल रही है। निकालो, कहाँ है?

हनुमान ने संजीवनी निकाल कर रख दी। कहा- मुझे आपके बड़े भाई रामचंद्र ने इस दवा को लेने के लिए भेजा था।

शत्रुघ्न ने भरत की तरफ देखा। बोले- बड़े भैया यह क्या करने लगे हैं? स्मगलिंग में लग गए हैं। पैसे की तंगी थी तो हमसे मंगा लेते। स्मगल के धंधे में क्यों फंसते हैं? बड़ी बदनामी होती है।

भरत ने हनुमान से पूछा- यह दवा कहाँ ले जा रहे थे? कहाँ बेचोगे इसे?

हनुमान ने कहा- लंका ले जा रहा था।

भरत ने कहा- अच्छा, उधर उत्तर भारत से स्मगल किया हुआ माल बिकता है। कौन खरीदते हैं? रावण के लोग?

हनुमान ने कहा- यह दवा तो मैं राम के लिए ही ले जा रहा था। बात यह है कि आपके बड़े भाई लक्ष्मण घायल पड़े हैं। मरणासन्न हैं। इस दवा के बिना वे बच नहीं सकते।

भरत और शत्रुघ्न ने एक-दूसरे की तरफ देखा। तब तक रजिस्टर में स्मगलिंग का मामला दर्ज हो चुका था।

शत्रुघ्न ने कहा- भरत भैया, आप ज्ञानी हैं। इस मामले में नीति क्या कहती है? शासन का क्या कर्त्तव्य है?

भरत ने कहा- स्मगलिंग यों अनैतिक है। पर स्मगल किए हुए सामान से अपना या अपने भाई-भतीजों का फायदा होता हो, तो यह काम नैतिक हो जाता है। जाओ हनुमान, ले जाओ दवा।

मुंशी से कहा- रजिस्टर का यह पन्ना फाड़ दो।


इस किताब को खरीदने के लिए ‘अपनी अपनी बीमारी’ पर या नीचे दी गयी इमेज पर क्लिक करें।

 

‘अपनी अपनी बीमारी’ किताब की समीक्षा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

‘अपनी अपनी बीमारी’ से कुछ मज़ेदार और उत्कृष्ट पंक्तियाँ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


Link to buy the book:

हरिशंकर परसाई
हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई (22 अगस्त, 1924 - 10 अगस्त, 1995) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा।

All Posts

Subscribe here

© 2018 पोषम पा ALL RIGHTS RESERVED | ABOUT | CONTACT | PRIVACY POLICY | TERMS OF USE

Don`t copy text!