रहना चाहती हूँ

शाश्वतता को तलाशते हुए
जब मृत्यु के समक्ष स्थिरता
को पाओगे तो पूछना
अब कितनी नश्वरता शेष है
जीवन की अस्थिरता में
शेष रहेगा तो बहा हुआ
शोणित और लवण कण
जो शाश्वत रहेंगे सदियों तक।
इसलिए
रहना चाहती हूँ अस्थिर
उन स्वेदकणों की भाँति
जो शेष है अभी भी तुम्हारी
रोमावलियों में।

– हर्षिता पंचारिया