रसोईघर में एकदम ठीक अनुपातों में ज़ायक़े का ख़्याल
कि दाल में कितना हो नमक
जो सुहाए पर चुभे नहीं,
कितनी हो चीनी चाय में
कि फीकी न लगे और ज़बान तालु से चिपके भी नहीं

इतने सलीक़े से ओढ़े दुपट्टे
कि छाती ढकी रहे
पर मंगल-सूत्र दिखता रहे,
चेहरे पर हो इतना मेकप
कि तिल तो दिखे ठोड़ी पर का
पर रात पड़े थप्पड़
का सियाह दाग़ छिप जाए

छुए इतने ठीक तरीक़े से कि पति स्वप्न में भी न जान पाए
कि उसके कंधे पर दिया सद्यः तप्त चुम्बन उसे नहीं, दरअसल उसके प्रेम की स्मृति के लिए है

इतनी भर उपस्थिति दिखे कि
रसोईघर में रखी माँ की दी परात में उसका नाम लिखा हो
पर घर के बाहर नेम प्लेट पर नहीं,
कि घर की किश्तों की साझेदारी पर उसका नाम हो
पर घर-गाड़ी के अधिकार-पत्रों पर कहीं नहीं।

कुछ इतना सधा और व्यवस्थित है स्त्री मन
कि कोई माथे पर छाप गया है—
“तिरिया चरित्रम
जिसे देवता भी नहीं समझ पाते, मनुष्य की क्या बिसात…”

और इस तरह स्त्री को ‘मनुष्यों’ की संज्ञा और श्रेणी से बेदख़ल कर दिया गया है

इतनी असह्य नाटकीयता और यंत्रवत अभिनय से थककर
इतने सारे सलीक़ों, तरतीबी और सही हिसाब के मध्य
एक स्त्री थोड़ा-सा बेढब, बे-सलीक़ा हो जाने
और बे-हिसाब जीने की रियायत चाहती है…

कात्यायनी की कविता 'इस स्त्री से डरो'

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सपना भट्ट
25 अक्टूबर को कश्मीर में जन्म..., शिक्षा-दीक्षा उत्तराखंड में, अंग्रेज़ी से परास्नातक और उत्तराखंड में ही शिक्षा विभाग में शिक्षिका पद पर कार्यरत। साहित्य सिनेमा और संगीत में रुचि। ब्लॉग्स और पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।