रुचि

‘रुचि’ – वैरमुत्तु

(कविता अंश; कविता संग्रह ‘बिंदु सिन्धु की ओर’ से)

रुकिए ज़रा!
बताइए तो-
‘हाँ’
या
‘नहीं’

हाड़ कँपाती सर्दी में
प्रातः पूस के महीने में
झरने के गुनगुने जल में
नहाया है एक बार भी कभी?

तांबूल रंजित
सांध्य गगन में
पंक्ति बाँधे बसेरे की ओर
उड़ते पंछियों के वितान को
आँखों से ओझल होने तक
अपलक नयनों से निहारा है कभी?

पूनम की धवल चंद्रिका जब
पानी पर लिखती प्रणय कहानी
उस आलोक-पथ को अवलोकते
चहलकदमी करने की मस्ती के लिए
मन मचला है कभी मानव, बोलो तो?

मंजरियाँ आम्र-तरु की सुनहली सुन्दर
बदलती रंग कैसे, किस पल
छान-बीन कर भेद जानने को
कुलबुलाया है दिल तुम्हारा कभी?

छुई-मुई को स्पर्श से सुलाकर
पुनः प्रस्फुटित होने तक
प्रतीक्षा में पाँवड़े बिछाए हैं कभी?

कुशल पूछने कभी
अपने देस जाते-जाते
खैरियत तलब की कभी
तरणी तट के तरुओं से?

अप्रैल मास में
रात की गाड़ी में
खिड़की के पास बैठने
मचल उठे हो कभी?

पिपीलिका-पंक्ति का
पीछा करके हौले-हौले
उनका पड़ाव जानने का
प्रयास किया है कभी?

‘हे तरुण बाले!’

…………………….
…………………….

यदि
नहीं,
तो
जन्मे हो तुम
महज़
मतदाता सूची के लिए!

■■■

Random Posts:

Recent Posts

नन्ही पुजारन

नन्ही पुजारन

'नन्ही पुजारन' - मजाज़ लखनवी इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन पतली बाँहें पतली गर्दन भोर भए मंदिर आई है आई…

Read more
घाटे का सौदा

घाटे का सौदा

'घाटे का सौदा' - सआदत हसन मंटो दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक लड़की चुनी और बयालीस…

Read more
पेट की खातिर

पेट की खातिर

'पेट की खातिर' - विजय 'गुंजन' उन दोनों के चेहरों पर उदासी थी। आपस में दोनों बहुत ही धीमी आवाज…

Read more

Featured Posts

मैं पाँचवे का दोषी हूँ

मैं पाँचवे का दोषी हूँ

'मैं पाँचवे का दोषी हूँ' - विशेष चन्द्र 'नमन' शाम के लिए पिघली है धूप लौटा है सूरज किसी गह्वर…

Read more
सा रे गा मा ‘पा’किस्तान

सा रे गा मा ‘पा’किस्तान

सा रे गा मा 'पा'किस्तान - शिवा सामवेद से जन्मे सुरों को लौटा दो हिन्दुस्तान को और कह दो पाकिस्तान से…

Read more
प्यार मत करना

प्यार मत करना

'प्यार मत करना' - कुशाग्र अद्वैत जिस शहर में पुश्तैनी मकान हो बाप की दुकान हो गुज़रा हो बचपन हुए…

Read more

Leave a Reply

Close Menu
error: