‘साँवली मालकिन’ – इ हरिकुमार

(रूपांतरण: पूर्णिमा वर्मन, रीना तंगचन)

हर रोज़ झोपड़ी के चबूतरे पर बैठी हुई सुलू पिता को पगडण्डी से ऊपर जाते हुए देखकर सोचती है – मेरी माँ कब आएगी?

कल रात उसने सपने में माँ को फिर देखा। माँ ने पास आ कर सुलू को गले से लगाया। हर रोज़ वह यही सपना देखती है – माँ आती है, उसे गले से लगाती है, गोद में बैठाती है, उसके बालों को सहलाती है। रोज़ सपने में माँ को देखती तो है पर माँ का चेहरा याद नहीं रहता। फिर भी मिलने का संतोष बना रहता है।

वह रोज़ सुबह पिता से कहती है, “अप्पा, मैंने एक सपना देखा”। उस समय तामि भी नहीं पूछता कि चार साल की सुलू ने सपने में क्या देखा। उसे मालूम है कि सुलू कौन सा सपना देखती है। वह रोज़ एक ही सपना तो देखती है और काम पर जाते समय याद दिला देती है कि वह माँ को वापस लाने की याद रखे।

हर रोज़ ऐसे ही सुबह होती है। सुलू का सारा दिन झोपड़ी के बाहर इस चबूतरे पर बीतता है, माँ का इंतज़ार करते, अकेले खेलते हुए, भूखे पेट कभी-कभी कांजी पी कर, देर तक शाम ढले पिता के काम से वापस लौटने तक।

मालिक की हवेली के सामने कड़ी दोपहर में तपते हुए सूरज के नीचे तामि खड़ा है। दूर छायादार वृक्ष उसे हाथ हिला कर अपनी ओर बुलाते हैं लेकिन तामि को ज़मींदार का इंतज़ार है। वह बार बार खड़े हो कर ऊपर देखता है और बैठ जाता है। आधे घंटे के कठिन इंतज़ार के बाद ज़मींदार का नौकर संदेश देता है – “मालिक से आज मुलाक़ात नहीं होगी।”

तामि बिना मुलाक़ात किये कैसे चला जाए?

जब तामि की पत्नी ज़मींदार के घर आई थी तो यह तय हुआ था कि कर्ज के पैसे वापस करते ही वह पत्नी को घर वापस ले आएगा। लेकिन ऐसा हो ही नहीं पाया। आज भी तामि के हाथ ख़ाली हैं। दो हज़ार रूपये का कर्ज़ लिया था उसने। दो हज़ार रूपये वह कहाँ से लाए? और उसका ब्याज? वह तो उसे मालूम भी नहीं कि कितना हो गया होगा। फिर भी वह ज़मीदार से पूछना चाहता है कि क्या एक हफ्ते के लिए वह अपनी पत्नी को घर ले जा सकता है? वह इस तरह की ज़िन्दगी से तंग आ गया है।

बाहर खड़े हुए तामि अंदर देख सकता है। पूर्व के द्वार के भीतर अंधेरा है। अंधेरे के अंदर से मालकिन बाहर आई और तामि को खड़े देख कर पूछा, “तामि, यहाँ कैसे खड़े हो?”

“ऐसे ही मालकिन।”

“तुम्हें गाभिन नंदिनी गाय दी थी। सुना है हफ्ते भर पहले ब्याई है। उसको वापस कब कर रहे हो?”

“दो दिन बाद वैद्य ने एक दवा देने को कहा है, उसके बाद नंदिनी को वापस कर दूँगा।”, तामि ने जवाब दिया।

“उसे जल्दी वापस कर दो। हर किसी को दूध चाहिए।”

“ठीक है, मालकिन।”

इसके बाद भी तामि खड़ा ही रहा। मालकिन ने पूछा, “अब क्या चाहिए?”

तामि कुछ नहीं बोला। मुँह झुका कर सिर खुजाने लगा।

मालकिन ने पूछा, “बोलो तामि क्या बात है?”

“हुजूर मैंने लक्ष्मी के बारे में मालिक से कहा था।”

यह सुनते ही मालकिन मुँह फुला कर बिना कुछ जवाब दिये अंदर चली गई। तामि ने उसे घर के अंधेरे में गुम होते हुए देखा। हर रोज़ वह तामि और उसकी बेटी के लिये खाने का कुछ सामान देती है लेकिन आज उसने वह भी नहीं दिया।

अब तामि क्या करे? क्या वापस घर लौट जाए? सुलू माँ के बारे में पूछेगी तो वह क्या जवाब देगा? फिर किसी और दिन का वायदा करना होगा यह सोचते हुए तामि भारी कदमों से धीरे-धीरे घर लौट पड़ा।

हवेली की दूसरी मंज़िल से दो आँखें घने पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए तामि का पीछा करती हैं – जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो जाता। इसके बाद लक्ष्मी नीचे आकर दोपहर के भोजन के लिये ज़मींदार की प्रतीक्षा करती है। पान में लौंग, इलायची, कत्था, चूना सजा कर बीड़ा बनाती है। उसे करीने से पीतल की थाली में सजाती है। बिस्तर की चादर बदलती है। तकिये का खोल बदल कर उसे ठीक से लगाती है। कपड़े बदल कर सजती-संवरती है और गुलाबजल से सुवासित होकर ज़मींदार की प्रतीक्षा करती है।

कभी वह खिड़की पर खड़ी होती है, कभी फ़र्श पर बैठती है, कभी खेत की ओर पेड़ों को देखती है और कुछ विचार उसके मन को मथने लगते हैं – अभी तक उसका पति घर पहुँच गया होगा.. सुलू ने अपनी माँ के बारे में पूछा होगा.. तामि ने फिर से अगली बार का वायदा किया होगा, फिर सुलू ने क्या जवाब दिया होगा?

खट, खट, खट!!

लक्ष्मी खड़ी हो जाती है। पदचाप नज़दीक आती है। दरवाज़ा खुला है। ज़मींदार आता है और दरवाज़ा बंद करके सिटकनी चढ़ा देता है। वेष्टि को उतार कर खूँटी पर टाँग देता है और स्नान करने चला जाता है।

लक्ष्मी पलंग के पायताने बैठ कर पान बना रही है। ज़मीदार कहता है, “तामि आया था।” लक्ष्मी चुप रहती है।

“तुम्हें पता है वह किसलिए आया था?”

“हूँ।”

“तुम सोचती हो मैं तुम्हें भेज दूँगा?”

लक्ष्मी चुपचाप ज़मींदार के सीने पर हाथ फेरती है। उसकी श्यामल उँगलियाँ ज़मींदार के गोरे सीने पर बालों को सहलाती हैं। वह लक्ष्मी को आलिंगन में लेते हुए पास बैठने की जगह बनाता है। लक्ष्मी को पान की सुगंध पसंद है। पान के साथ मिली जुली ज़मींदार के शरीर की गंध लक्ष्मी को आकर्षित करती है। लक्ष्मी के कोमल शरीर का स्पर्श करते हुए वह पान का रस निगल कर कहता है – “तुम्हें मालूम है मैंने तामि को २००० रुपए दिए हैं।”

“हूँ” – लक्ष्मी सिर्फ़ इतना ही बोलती है।

ज़मींदार को यही पसंद है। ऐसा न करने पर वह नाराज़ हो सकते हैं। पर इस समय वह हुंकारी देना भूल गई। इसके दिमाग में पुराना दृश्य घूमने लगा है। हवेली के बाहरी आँगन में वह तामि के पीछे डरती हुई खड़ी है। ज़मींदार दूसरी मंज़िल के जंगले को छोड़ कर नीचे आता है और लक्ष्मी से पूछता है- “मेरी बात तुम्हें याद है।”

लक्ष्मी कहती है, “हूँ।”

“जब तुम दो हज़ार रुपए ब्याज के साथ वापस करोगे उस समय इसे वापस ले जाना।”

तामि ने अपने कंधे पर गमछे को ठीक करते हुए, धोती के छोर से मुँह को ढ़ँकते हुए सिर झुका कर कहा था, “जी हुज़ूर।”

फिर उसने लक्ष्मी से पूछा था, “तुम्हारा नाम क्या है?”

“लक्ष्मी”, उसने कहा था।

“ठीक है, दक्षिण में रसोई के पास जाओ वहाँ मालकिन होगी।”

लक्ष्मी के लिए माहौल परिचित था। धान कूटना, उड़ाना, अनेक नौकर-नौकरानियाँ इस काम में लगे हुए – लेकिन इस समय उसकी परिस्थिति अलग थी। वह मजदूरी करने नहीं आई थी, बंधुआ थी। उसे उनकी हुंकारें, उनके चेहरे और हाव भाव रुचिकर नहीं लगे। न ही उन लोगों को लक्ष्मी का इस प्रकार आना अच्छा लगा। दोपहर में वह अन्य महिलाओं के साथ भात और कांजी खाने बैठी। शाम के समय सभी कामगार औरतें अपनी दिहाड़ी लेकर चली गईं। लक्ष्मी अकेली रह गई। उसे पति और बेटी की याद आने लगी। अंधेरा धीरे-धीरे घना हो रहा था। उसका मन दुख से भर गया और वह रोने लगी।

उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस रात में वह क्या करे। मालकिन का व्यवहार कठोर था पशु के समान। लक्ष्मी ने सुना मालकिन रसोईघर में नौकरानी से बात कर रही थी। लक्ष्मी को मालूम है – उस नौकरानी का नाम माधवी है। छोटी खिड़की के पीछे रात का भोजन तैयार करते और आते जाते वे लोग लैंप के प्रकाश में दिखाई पड़ रहे थे।

इसी समय एक लालटेन का प्रकाश उसके पास आया। अब लालटेन ऊँची उठ कर ठीक उसके चेहरे के सामने थी – और ज़मींदार के चेहरे पर अनेक प्रश्न चिह्न। वह बिना कुछ बोले धीरे-धीरे दूर चला गया। थोड़ी देर में माधवी और मालकिन उसके पास आए। नौकरानी के हाथ में एक कटोरी में तेल, सुवासित साबुन, धोबी के धुले और इस्त्री किए कपड़ों का एक जोड़ा था। लक्ष्मी नौकरानी के साथ तालाब पर चली गई।

नहाने के बाद वह अच्छे कपड़े पहन कर घर लौटी थी। रसोईघर में उसे अच्छा खाना दिया गया था। उस समय नौकरानी का व्यवहार बेहतर था। उसे याद आया कि दोपहर में कांजी और चावल देते समय उसका व्यवहार कितना कठोर था। इस समय मालकिन का व्यवहार भी दयापूर्ण था।

आज इस समय वह ज़मीदार के कंधे पर लेटे-लेटे सोच रही है। किस तरह वह ओखलवाले कमरे से रसोईघर और रसोईघर से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर ज़मीदार के शयनकक्ष तक पहुँच गई है। दिन, महीने, साल धीरे-धीरे बीतते गए हैं। वह धीरे-धीरे इस माहौल की अभ्यस्त हुई है। उसे यह भी नहीं याद कि वह कौन है। कभी कभी उसे अनुभव होता है – मेरा पति, मेरी बेटी, मेरा घर मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। क्या उसके जीवन का कोई अर्थ है?

“हूँ।”, अचानक उस तंद्रा से बाहर आकर वह जवाब देती है, “मैं अपनी बेटी को देखना चाहती हूँ।”

“हूँ”, एक भारी आवाज़ के साथ ज़मींदार हामी भरता है।

अगली सुबह रसोईघर में लक्ष्मी को ज़मीदार के लिए चाय बनाते समय मालकिन ने बताया, “आज तुम्हारी बेटी आएगी।”

“अच्छा”, वह कहती है।

“ज़मींदार ने तुम्हें नहीं बताया?”

“नहीं मालकिन।”

“तामि को किसी से संदेश भेजा था।”

बेटी से मिले बिना बहुत समय बीत गया – दो साल या तीन साल। सालों का गणित भी वह भूल गई है। मेरी बेटी बड़ी हो गई होगी।

लक्ष्मी चाय लेकर ज़मींदार के कमरे में चली गई। ज़मींदार उठ कर लक्ष्मी के इंतज़ार में बैठा था, उसने सिरहाने तकिया लगा कर पीठ को पीछे टिका दिया। पैरों को सीधा किया और सामने फैला दिया। लक्ष्मी उसके पायताने बैठ गई।

“मेरी बेटी को बुलाया है?”, लक्ष्मी के प्रश्न में कृतज्ञता है।

“हूँ”, भारी आवाज़ के साथ ज़मींदार ने कहा। वह सुबह आएगी और दोपहर बाद वापस चली जाएगी।”

“ठीक है।”, लक्ष्मी ने जवाब दिया।

“तुम्हारी बेटी को देने के लिए मैंने नौकर से दो फ्राक मँगवाए हैं।”

“अच्छा।”, वह प्रसन्नता और संतोष से ज़मींदार को देखती है।

“तुम जानती हो यह सब काम मैं क्यों करता हूँ?”

“हूँ”

“क्यों?”

“.. .. .”

“मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। यह तुम समझती हो और हर रोज़ मेरा ख़याल रखती हो।”

“हूँ।”

लक्ष्मी बेचैनी से इधर उधर टहलती है। गलियारों से कमरों और रसोई से होते हुए उसकी आंखें सीधे द्वार पर आ जाती हैं। द्वार के बाद सूर्य के प्रकाश में खुले खेत हैं। वह मन की आंखों से देखती है – एक छोटी लड़की सड़क पर उसकी ओर चली आ रही है। उसका मन करता है वह सीढ़ियां उतर कर नीचे आ जाए और बाहर जाकर प्रतीक्षा करे। पर वह ऐसा नहीं कर सकती। ज़मींदार की आज्ञा है कि वह बाहर न जाए। वह चारदीवारी के भीतर बने तालाब तक जा सकती है पर उसके बाहर नहीं। बाहरी आंगन में भी जाना मना है। तामि घर में काम करने के लिये वहां आता-जाता है उस समय भी बाहर निकलना या उससे मिलना लक्ष्मी के लिये मना है।

जब तामि खेत में काम करता है तब वह भीतर से उसे देख सकती है पर तामि उसे नहीं देख सकता।

वह फावड़े से ज़मीन खोदता है। थक कर फावड़े को बगल में रख कर सुस्ताता हुए हवेली की ओर देखता है – शायद किसी खिड़की से लक्ष्मी दिख जाए। पर वह उस समय जल्दी से अंदर चली जाती है। वह ज़मींदार से डरती है। ज़मीदार की क्रूरता की कहानियाँ उसने अनेक लोगों से सुनी हैं पर लक्ष्मी के सामने ज़मींदार हमेशा ही सदय बना रहा है।

जब भी ज़मींदार पैसे लाता है वह अंदर ही अंदर डरती है – क्या उसे यह सब छोड़ कर जाना होगा? इस समय वह शर्त उसे याद आती है। शर्त का क्या परिणाम होगा, यह उसे ठीक से मालूम नहीं। क्या तामि ने पैसे वापस कर दिये तो उसे यह सब छोड़ कर जाना होगा? क्या तामि पैसे वापस कर देगा? क्या तामि के पास इतने पैसे होंगे? इस समृद्धि में रहते हुए जब भी बेटी का भोला चेहरा याद आता है, उसे यह सब निरर्थक लगने लगता है।

नौकर ने रसोई के दरवाज़े से लक्ष्मी को पुकारा और एक पैकेट थमाया। लक्ष्मी ने पैकेट खोले – दो सुंदर फ्राकें। एक छोटे लाल फूलों वाली नीली फ्राक और दूसरी पीली हरी नाशपातियों वाली। साथ में दो चडि्डयाँ। उसके ख्याल में आया इन्हें पहन कर सुलू कितनी सुंदर लगेगी। सुलू ने आजतक इतनी सुन्दर फ्राकें कभी नहीं पहनीं।

तामि सुलू को लेकर पूर्व के रसोईघर की ओर पहुँच गया। माधवी सुलू को लेकर अंदर आ रही है। लक्ष्मी उन्हें देखकर आंसू नहीं रोक पाती। कितना दुख है उसे – मैं अपनी बेटी का चेहरा तक भूल गयी।

सुलू आश्चर्य से अपरिचित लोगों को देखने लगी। यह उसकी माँ नहीं हो सकती। उसकी नज़रें माँ को इधर उधर ढूँढने लगीं। लक्ष्मी ने पुकारा, “बेटी, इधर आओ” और सुलू को अपनी गोद में बैठा लिया। सुलू आश्चर्य से लक्ष्मी को देखने लगी। सोचने लगी – यह अच्छे कपड़े पहनने वाली, तेल और साबुन से महकने वाली औरत कौन है? उसने ऐसी ठाठदार औरत पहले कभी नहीं देखी। उसी समय मालकिन ने अंदर से आकर लक्ष्मी से पूछा, “तुम्हारी बेटी आई?”

सुलू डर गयी। उसकी माँ कहां है? उसे यह औरत नहीं चाहिये सिर्फ अपनी माँ चाहिये। उसे वहां खाने की अच्छी-अच्छी चीज़ें मिलीं पर खाते हुए भी वह यही सोचती रही – ये सब कौन हैं? मेरी माँ कहां है? खाने के बाद लक्ष्मी ने सुलू को तेल लगा कर नहला दिया। और अच्छी फ्राक पहनाते हुए बोली, “देखो सुलू, माँ तुम्हारे लिये नयी फ्राक लायी है।”

सुलू यह सुन कर खुश हो गयी, पर उसकी माँ है कहां? नयी फ्राक पहने हुए भी उसकी आंखें माँ को ही खोजती रहीं। पूछते हुए उसे डर लगा। वह किससे पूछे कि मेरी माँ कहां है?

शाम का सूरज ढलते ही मुण्डियान खेत के साये लंबे होने लगे। खेत के सामने कारकुन्न पहाड़ है। इस समय इसके पेड़ों पर चिड़ियाँ लौटने लगीं। धान कूटने वाली औरतें भी घर जाने लगीं। खेत के बीच बने झोपड़ों में रोशनी जल गयी है। मजदूरों ने सूखी पत्तियों को इकट्ठा कर के आग लगा दी है। अंधेरे में धुएं के इस ओर खड़ा तामि सुलू का इंतज़ार कर रहा है।

नौकर तामि से बातें करने लगता है।

“ज़मींदार ने सुलू के लिये दो फ्राक मंगवाए हैं। तुम्हारी पत्नी किस्मत वाली है। वह यहां आराम से है। उसे वापस मत बुलाओ। बाद में तुम्हारी बेटी भी यहीं आ जाएगी।”

तामि कोई जवाब नहीं देता। सिर्फ सोचता है – मैं क्या कहूँ। दो हज़ार रूपये और उसका ब्याज मैं कैसे चुकाऊंगा। न मैं कभी पैसे चुका पाऊँगा, न कभी लक्ष्मी लौटेगी।

खेतों के बीच बनी मेड़ों पर से गुज़रते नौकर नौकरानियों के बीच उसे एक नौकरानी के साथ सुलू दिखाई दी। वह ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रही थी। दौड़ कर पास आई। तामि ने उसे गोद में उठा लिया। नौकरानी ने एक छोटी थैली में दो फ्राकें तामि को पकड़ा दीं, बोली, “तुम्हारी बेटी के लिये उपहार में दी हैं।”

तामि ने सुलू को चूमा और पूछा, “माँ को देखा?”

“माँ?” सुलू आश्चर्य से बोली। “मैंने माँ को नहीं देखा।”

“ज़मींदार के घर में कौन थीं?”

“वहाँ? एक गोरी मालकिन और एक साँवली मालकिन। फिर ज़रा-सा रुक कर बोली, “वह साँवली मालकिन बहुत अच्छी है। उसने मुझे यह फ्राक दी।”

“वह तुम्हारी माँ है।”

“नहीं, वह मेरी माँ नहीं है। वह ज़मींदारिन है। साँवली मालकिन।” और सुलू चुप हो गई। कुछ सोचने लगी।

तामि दिया जला रहा है। दीपक की रोशनी में सुलू का छोटा-सा चेहरा चमक रहा है। इस समय भी सुलू कुछ सोच रही है। बहुत-सी बातें सुलू के छोटे से दिल में बार-बार आ रही हैं। वह सोच रही है कि यह साँवली मालकिन कौन है, वह मुझे प्यार क्यों करती है, वह मेरे लिए फ्राक क्यों ख़रीद कर लायी, इन सवालों के जवाब सुलू को नहीं मालूम। वह धीरे से पुकारती है, “अप्पा…”

“क्या है बेटी?”

“मेरी माँ कब आएगी?”

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