‘समाज’ – पुनीत कुसुम

कल एक प्राणी से मुलाक़ात हुई
जब मैंने उससे उसका नाम पूछा
तो वह बोला- ‘समाज’
प्राणी इसलिए कहा
क्योंकि उसकी शक्ल और हरकतें
मानवों से तो नहीं मिलती थीं
संवेदनाओं से शून्य था
मान्यताओं से बेशर्म

देह भी उसने कुछ अजीब सी पायी थी
सारे शरीर पर केवल मुँह ही मुँह थे
कान नहीं थे, दो मुँह थे
कुछ भी सुनता नहीं था
आँखें नहीं थी, दो और मुँह थे
कुछ भी देखता नहीं था
हाथ नहीं थे, उनकी जगह भी मुँह थे
कुछ भी करता नहीं था
यहाँ तक कि उसकी टांगों के बीच भी केवल एक मुँह ही था
तभी तो उसके दो बेटे
जो रूढ़ियों के प्रसव से पैदा होकर
प्रतिष्ठाओं के पालने में पले हुए थे
दो भाषण सरीखे खड़े थे
नवसंस्कृति की नींव में स्तम्भ बनने
और मुझ जैसे मूल्यहीन इंसान को
अपने नीचे दबा देने को आतुर

मैंने मुँह फेर लिया
मेरे पास केवल एक ही मुँह था
जिससे मुझे कविताएँ सुनानी थीं..।

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चित्र श्रेय: Joanjo Pavon


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पुनीत कुसुम
पुनीत कुसुम

कविताओं में खुद को ढूँढती एक इकाई..!

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