संजोग सम्पूर्ण संग का

दो आत्माएँ मिलें और…

एक चाँद बन जाए… तो दूसरी
दोनों के हिस्से आए आसमान से, टूट कर गिरता हुआ तारा!

एक प्रेम भरी कविता बने… तो दूसरी
पहली पंक्ति में अकेली बैठी कच्चे कानों वाली, दुनिया की सबसे उम्रदराज़ बुढ़िया!

एक कहानियाँ बन जाए परियों की… तो दूसरी
आवाज़ों की दुनिया से दूर होती, उनींदी सी बच्ची!

एक रंगों को ओढ़े इंद्रधनुष बने… तो दूसरी
खुद ही के अश्रुओं से तर, दृष्टिहीन बारिश!

एक लोकगीत बने पहाड़ों का… तो दूसरी
सिर्फ़ उसी गीत का राग गा सके, ऐसी बेज़ुबान गायिका!

एक तर्कविहीन रस्म बने… तो दूसरी
सदियों तक उसे निभाती कोई अंधविश्वासी आदिवासी!

केवल तभी संजोग बनता है…
सम्पूर्ण और अजर-अमर संग का,
हर युग से हर काल तक!!