शायरी का इंक़लाब

‘शायरी का इंक़लाब’ – शैल चतुर्वेदी

एक दिन अकस्मात
एक पुराने मित्र से
हो गई मुलाकात
कहने लगे- “जो लोग
कविता को कैश कर रहे हैं
वे ऐश कर रहे हैं
लिखने वाले मौन हैं
श्रोता तो यह देखता है
कि पढ़ने वाला कौन है
लोग-बाग
चार-ग़ज़लें
और दो लोकगीत चुराकर
अपने नाम से सुना रहे हैं
भगवान ने उन्हें ख़ूबसूरत बनाया है
वे ज़माने को
बेवकूफ़ बना रहे हैं
सूरत और सुर ठीक हो
तो कविता लाजवाब है
यही शायरी का इंक़लाब है
उर्दू का रिजेक्टेड माल
हिन्दी में चल रहा है
चोरों के भरोसे
ख़ानदान पल रहा है
ग़ज़ल किसी की
फ़सल किसी की
भला किसी का

एक लोकल कवि की लाइन
अखिल भारतीय ने मार दी
लोकल चिल्लाया
“अबे, चिल्लाता क्यों है
तेरी लोकल लाइन को
अखिल भारतीय बना दिया
सारे देश में घुमा दिया..”

■■■

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