‘शायरा’ – वर्षा गोरछिया

मेरे होने की वारदात को
पेज थ्री की रंगीन
सुर्खियों की तरह पढ़ा जाता है
मेरी शख़्सियत का सुडोल होना ज़रूरी है
और ज़िस्म की तराश का भी
घनी सियाह ज़ुल्फ, बिना निचुड़े नर्म होंठ
बेदाग़ शफ़्फ़फ़ शुतरमुर्ग़ सी गर्दन
ज़मीन के नीचे बहते झरने का
अहसास ऐसा हो कि
दूर से ही सियार आँखों से
शिकार की मांनिद महसूस किया जा सके
फिर उसके बाद क़ीमती से लिबास,
जगमगाते गहनों से
अपने रिस्ते हुए ज़ख़्मों को छुपाकर
आँखों में जमते ख़ून के धब्बों को काजल
और अपनी पलकों पर बेजान लम्हों को
ग्लिट्री लाइनर की तरह सजाकर
किसी भभकते बिस्तर में घुटन भरी रात को
विसाल का पैराहन देकर मैं
अपने मरमरी हाथों से हवा के बदन की
चुटकी लेते हुए गुज़रती हूँ तब
वे अपने चेहरों पर किसी नुमाइशी मुजस्समों सी
खिलखिलाती नक़ली मुस्कान लपेटकर
किसी मुर्दाख़ाने से उठाकर लाई गई
खोपड़ियों से उठती सड़ाँध सी
दाद का निवाला मेरे मुँह में ठूंसते हुए
मेरी गली के कुत्तों की तरह मुझे घेरते हैं
और कोई झूठन न मिलने पर
पूँछ हिलाते हुए मुड़ जाते हैं
तब ही कोई बेनियाज़ शायर
अपनी मर्दाना हवस भरी खुशफ़हमी को
उम्दा ग़ज़ल समझता हुआ
अपनी लकड़भग्गे सी बेशर्म नज़रों को
झुकाकर जब अदब का सलाम कहता है
ठीक उसी वक़्त मेरी मौत हो रही होती है…

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(यह नज़्म हैरी अटवाल और तसनीफ़ हैदर द्वारा सम्पादित किताब ‘रौशनियाँ’ से है, जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की बीस समकालीन शायरों की कविताओं/नज़्मों का संकलन है। 7 जुलाई 2018 को इस किताब का विमोचन है, जिसकी डिटेल्स यहाँ देखी जा सकती हैं!)