तुम प्रेम परिधि के मध्यबिंदु हो, रौद्ररूप हो, शिव हो
तुम गंगा को जूड़े में बाँधे माहेश्वर हो, शिव हो

तुम कि जिसे अपने अपमान का क्षोभ नहीं है
तुम कि जिसे कैलाश गान का लोभ नहीं है
पर अगर सती का थोड़ा भी अपमान हुआ
गर उसने ख़ुद को अग्निकुंड में त्याग दिया
तब कोलाहल भारी होगा शमशानों में
तब तांडव होगा धरती के मैदानों में

तब राख उड़ी होगी जग में, नरमुण्ड कहीं बिखरे होंगे
कर धारण जलती-देह सती शिव कितनी बार मरे होंगे

हे विषधर! प्रेम तुम्हारा हरदम ऐसा सरल अजय हो
जिसने प्रेम में शिव को जीता तुम वह शिवमय शिव हो..