पूरी रात बिस्तर पर ख़ामोशी थी, बाहर की तरफ़ से एक नीली रोशनी धीरे-धीरे अपना अक्स बड़ा करती जा रही थी और मैं सोच रहा था, तुम इस वक़्त क्या कर रही होंगी? तुम सो रही होंगी या सोते में कोई ख़्वाब देख रही होंगी। इस दुनिया से उधर तुम्हारी जागती हुई आँखों में क्या अब भी वही बेचैनी है जो दिन के वक़्त थी? क्या तुम ख़्वाबों में पलकें झपकाती हो? या तुम समुन्दर, रेत, खेत या सड़क से किसी बिल्कुल अलग मक़ाम पर जा बैठती हो। मैं सोच रहा हूँ कि क्या तुम ख़्वाबों में भी सोचती हो? अगर सोचती हो तो क्या? तुम अपने वजूद से लिपटी हुई ख़ामोशी को किस हद तक उतार देती हो। लबों से निकली हुई ‘हम्म्म’ को कितना गहरा कर देती हो। तुम सियाह रात की अंधी सड़क से इस तरफ़ उजली चादर की सिलवटों पर क्या लिखती हो? मुझे जानना है। मगर मैं नहीं जान सकता। शायद तुम भी नहीं जान सकतीं। अभी इस वक़्त तुम सो रही हो और मैं अपने ख़यालों की रोशनी में तुम्हें देख रहा हूँ। पोरों से तुम्हारे ख़्वाब-आवर पहलुओं को नक़्श कर रहा हूँ। इधर कई रोज़ से बरसात नहीं हुई। तुम्हारे ख़्वाबों में होती है क्या? तुम जो किताब दिन में पढ़ती हो, जो ख़बर देखती या सुनती हो, जो कुछ भी ज़हन की क़ुरैशिया से बुनती हो, वो क्या ख़्वाब में भी इतना ही साफ़ होता है? या तुम ख़्वाब ही नहीं देखतीं। या फिर तुमने नींद के उतरते ही, जलती हुई उदासी पर पर्दे डाल दिए हैं, दिन की आवाज़ों को तकिए के नीचे दबा दिया है, बिखरे हुए दिमाग़ में उलझी हुई बातों को बालकनी में रख आयी हो और हर तरफ़ अंधेरा है। तुम सोती हुई कैसी लगती हो मैं जानता हूँ, मगर मैं जानना चाहता हूँ कि तुम नींद के अंदरून में, ख़्वाब के शिकम में कैसी लगती होंगी? क्या वहाँ रोशनी है? क्या वहाँ कोई है? क्या मैं हूँ वहाँ? आवाज़ आ रही है तुम्हें? मैं इंतिज़ार कर रहा हूँ, शायद तुम जवाब दोगी। शायद हम इस अँधेरी दुनिया में एक साथ आकर एक ऐसी ना-मुमकिन शाम में मिलेंगे, जैसे आईने के पीछे की उल्टी दुनिया में लोग अक्सर ख़ुद से मिलते रहते हैं। मगर उनकी ख़ुद से मुलाक़ात बहुत देर की नहीं होती, हमारी होगी और फिर इस अंधेरी दुनिया में हर चीज़ से नक़ाब उठ जाएगा। तुम मेरी आँखों पर हाथ रखकर देखोगी कि मैं सोता हुआ कैसा लगता हूँ, क्या मेरा मुँह थोड़ा-सा खुल जाता है? क्या मेरी पलकें हल्की-सी दराज़ बना लेती हैं? क्या उनमें ज़िंदगी है? तुम मेरी पलकों को चूम लोगी और सोचोगी कि मैं ख़्वाब में क्या देख रहा हूँ? तुम मुझसे बात करना चाहोगी, मुझे जगाने के लिए हल्के से मेरे गाल को चूमोगी, मैं तुम्हारी गर्म साँस की महक से जी उठूँगा, आँखें खोल दूँगा और तुम्हें ख़ुमार-आलूद आँखों से देखूँगा। फिर हम एक-दूसरे से लिपट जाएँगे। तुम मेरे सीने में मुँह छुपाकर कहोगी कि तुम एक नीम-मुर्दा ग़ैर-जज़बाती ज़िंदगी से तंग आ गई हो। अब तुम यहीं रहना चाहती हो, मेरे सीने की मुसलसल बोलती हुई तख़्ती पर अपना सर रखकर मुझे सुनना चाहती हो। फिर मैं तुम्हारा चेहरा ऊपर उठाकर देखूँगा। वहाँ एक सुकून-आवर थकावट जमी हुई है। पर्दे के उस पार से आती हुई नीली रोशनी अब अपना साया कम करती जा रही है। मगर इस अंधेरे में तुम्हारे चेहरे के ख़ुतूत को मैं उँगलियों की आँखों से पढ़ रहा हूँ। ये माथा है, जिसकी कुशादगी से उभरते हुए सवालात ने तुम्हारे अपने वजूद को बोझल बना दिया है, मगर इसमें जा-ब-जा हँसी के फ़व्वारे भी फूट रहे हैं। इसके अंदर रेशों का एक बारीक मुहल्ला है, इस मुहल्ले की दुकानों पर इन्सानी सफ़्फ़ाकी और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लगाए गए साइनबोर्ड हैं। इन रेशों से गुज़रने वाली हर सड़क पर एक सीधे तीर का निशान बना है, मगर फिर भी हर दो क़दम पर रास्ते मुड़ जाते हैं। ये ख़ुद को धोखे में रखने वाला कोई इलाक़ा है। इन आँखों पर पलकों के टाट लटके हुए हैं। आँखें जो छोटी हैं ना बड़ी। मगर शफ़्फ़ाफ़ हैं, जिनके किनारे बैठकर ख़ुद से भी कोई बात करने का मन नहीं करता। बस इनकी कलकल को देखते रहने, इन्हें भटकते हुए, सिमटते और खुलते, बहते हुए देखने में लुत्फ़ आता है। पलकों के किनारे उगे हुए स्याह दरख़्तों में परिंदे चहचहा रहे हैं, मोर फ़लक-शिगाफ़ चीख़ें लगा रहे हैं और चीलें आँखों की छत पर नंगी धूप में काली उदासी के टुकड़े छीनने के लिए झपटी जा रही हैं। आँखों के ठीक नीचे गालों की तमतमाहट है। इस पर तैरने वाली मेरी उँगलियाँ कुछ देर के लिए घुँघरू बांधकर रक़्स में खो जाती हैं। फिर मैं होंठों की तराश के जंगल में उतर जाता हूँ। इन होंठों पर बग़ावत के अलम लहरा रहे हैं। ये फड़कते हैं हर उस ना-इंसाफ़ी पर जो दुनिया ने ईजाद की है, ये थरथराते हैं इन्सानियत के क़त्ल पर। ये गुलाब जैसे ताज़ा-कार होंठ नहीं, बल्कि ख़ून में डूबी हुई सूरज की दो फाँकें हैं, जिनको आख़िर-ए-कार वक़्त के दरिया में अपनी लाल-लाल अंगारा आँखें लिए एक दिन ग़ुरूब हो जाना है। मगर जो ज़िंदा रहने की कोशिश से बाज़ नहीं आतीं। बल्कि हर शाम को डूबकर अगले रोज़ फिर नया जन्म लेती हैं, लबों को ख़ामोशी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने की जंग में हिस्सा लेने के लिए।

मुझे नहीं लगता कि तुम सो रही हो। तुम अपने चेहरे पर लिखी हुई तहरीर को पढ़ते हुए मुझे देख रही हो। और अंदर ही अंदर हँस रही हो। तुम हँसा मत करो। ये अच्छी बात नहीं है। जब मैं तुम्हें संजीदगी से बता रहा होता हूँ कि मैं क्या सोचता हूँ, तुम्हें पढ़कर क्या महसूस कर रहा होता हूँ। तब तुम्हारी हँसी मेरे अंदर उबलने वाले जज़बात के लावे पर पानी फेर देती है। मैं ऐसी हँसी से ख़ुश नहीं होता, मुझे तुम्हें संजीदा देखना ज़्यादा पसंद है। ख़ास तौर पर उस वक़्त जब मैं तुम्हें पढ़ रहा हूँ। तुम क्या सोचकर हँसती हो, यही ना कि मैं पोरों की नन्ही-सी दूरबीन से भी तुम्हें ठीक तरह नहीं पढ़ सकता। कि मैं इतना क़रीब होकर भी तुम्हें मुकम्मल नहीं जान सकता। मैं चाहता हूँ कि जिस वक़्त मैं तुम्हारे होंठों पर थिरकने वाली बग़ावत को इतने नज़दीक से देख रहा हूँ, तब तुम पर फ़र्ज़ है कि तुम मुझे अपने अंदर उतरता हुआ महसूस करो। तुम वो जानो, जो आज तक किसी ने कभी नहीं जाना। तुम महसूस करो कि कैसे कोई इन्सानी वजूद, किसी दूसरे इन्सानी वजूद में पैवस्त होता है। कैसे बिजलियाँ एक झटके में ज़मीन की कोख में उतर जाती हैं और किस तरह इन्सान मौत का दहाना छूते ही हवा की किसी अनहोनी झोली में गुम हो जाता है। ऐसे ही तुम्हें भी मुझे महसूस करना चाहिए। मुझे सोचना और देखना चाहिए। ये कोई गुनाह नहीं है। ये एक अज़ीम इन्सानी ख़िदमत है। क्योंकि आज तक मर्दों ने सिर्फ़ औरतों को भोगा है, उन्हें बिस्तर पर अपनी हवस का निशाना बनाया है, उन पर अपने वजूद के भारी भरकम जूतों, गर्म और बोझल साँसों से हमले किए हैं। मगर मैं ऐसा नहीं करना चाहता। मेरा इश्क़ और तरह का है, वो तुम्हें पढ़ना चाहता है, तुम्हें तुम्हारे हवाले से ही महसूस करना चाहता है, वो तुमको जानना चाहता है। तुम्हारे अंदर से बाहर तक की हर ख़्वाहिश को, अजीब-ओ-ग़रीब जज़्बों और बे-वक़त की उदासियों को इतना पा लेना चाहता है, जितना चकोर चांद को पाता है, भँवरा फूल को और शेर अपनी इशतिहा को।

ये रात मैं नहीं गुज़रने दूँगा। आज मैं लिखता रहूँगा। लिखता ही जाऊँगा। ये लिखना दरअसल तुम्हें तराशना है। तुम जो मेरी हो, आज़ाद हो, मगर बंधी हुई हो रिश्तों की अजीब-सी रस्सियों से। ये रस्सियाँ लोहे की ज़ंजीरों से ज़्यादा मज़बूत हैं। इन्हें पिघलाने का ख़याल तुम्हें नहीं आता और न कभी आ सकता है, क्योंकि तुम्हें इन रस्सियों से इश्क़ है। ये रस्सियाँ ही अब तुम्हारी शनाख़्त हैं। इनके दुख ही अब तुम्हारे दुख हैं, इनके सुख ही तुम्हारे सुख। इस वक़्त तुम एक ऐसे कमरे में क़ैद हो, जिसके सारे दरवाज़े खुले हुए हैं। बाहर का नज़ारा तुम्हें चौंकाता है, तुम्हें सहराकर रख देता है, कभी-कभी मीठी-सी उदासी से तुम्हारे पूरे जिस्म को भर देता है। मगर तुम इस कमरे से बाहर नहीं निकलोगी। तुम बराबर के बाज़ार से भी नहीं गुज़रोगी। तुम्हारे अगल-बग़ल बहुत-सी आवाज़ें आ रही हैं, मगर तुम इन आवाज़ों की सिम्त में नहीं दौड़ोगी। तुम यहीं बैठी रहोगी। इसी कमरे में, और ब-ज़िद रहोगी कि तुम इस कमरे से मोहब्बत करती हो। मगर क्या कमरे से बाहर निकलकर नई दुनिया में साँस लेना तुम्हारे और कमरे के रिश्ते को ख़त्म कर देगा। हाँ शायद तुम्हें यही डर है। या शायद तुम्हें डर नहीं। तुम्हें पता है कि तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकतीं, जिससे इस कमरे की दीवारों को तकलीफ़ पहुँचे। इन दीवारों के कानों से ख़ून बहे। इसके कोने में रखी हुई अलमारियों की चूड़ियाँ टूट जाएँ या आइनों की आँखों में आँसू तैरने लगें। नहीं, तुम इस कमरे से मोहब्बत नहीं करतीं, तुम अपने अंदेशों से मोहब्बत करती हो। तुम्हें वो इतने प्यारे हैं कि उन्हें छोड़कर जीना अब शायद तुम्हारे लिए ना-मुमकिन है।

मेरी इस चीख़-पुकार से बचने के लिए तुम पास रखा मोबाइल उठा लेती हो, बैट्री डाउन है, शायद पच्चीस परसेंट। मगर अभी मोबाइल की चमकती हुई ज़िंदगी को आधे घंटे की मोहलत है और ये आधा घंटा मेरी इस तहरीर की चीख़-ओ-पुकार से बचने के लिए बहुत है। तुम ट्विटर खोल लेती हो या फिर वाट्सऐप। वक़्त बिताने के लिए पुराने मैसेज, लोगों की बदली डीपीज़ या फिर उनके स्टेटस देखती हो। कोई मज़ेदार वीडियो देखकर तुम्हारी हँसी फूट पड़ती है। तुम हँसती हो, बे-तहाशा। फिर सोचती हो, लोग भी कितने बेवक़ूफ़ हैं। ऐसी बेकार वीडियो को पच्चीस लाख बार देखा गया है। तुम्हें नहीं पता कि तुम व्यूज़ की तादाद पर हँस रही हो या वीडियो असल में मज़ेदार है। तुम स्क्रॉल करती हो। नीचे एक मोटी-सी ख़बर है। तुम्हारे अपने मुल्क में एक ग़रीब मुस्लमान को भीड़ ने मारा पीटा है, उससे जय श्री राम के नारे लगवाए हैं। तुम्हारी आँखें मायूसी की ओस से भीगने लगती हैं, ये ख़बर ख़त्म होते ही दूसरी वीडियो अपने आप उछलकर सामने आ जाती है, यहाँ एक भीड़ किसी मंदिर को मिस्मार कर रही है। ये पड़ोसी मुल्क के मुसलमानों का कमज़ोर हिंदुओं की इबादत-गाह पर एक वहशियाना हमला है। फिर तुम वीडियोज़ देखती चली जाती हो। अब हर वीडियो में एक मंदिर है, एक मस्जिद है। कहीं-कहीं गिरजा में सतायी जाने वाली ननें भी हैं, मार खाते हुए पादरी भी हैं। ये वीडियोज़ सिर्फ़ अपने वक़्त की तारीख़ नहीं हैं। तुम सोचती हो, ये खोयी हुई तारीख़ की कोख से जन्म लेने वाले भूत हैं। ख़ूनी भूत। बे-दिमाग़ ज़ोमबीज़। अब तुम्हें दिख रहा है कि एक वीडियो में चालीस सालह कोई दुनिया से हारा हुआ आदमी, भीड़ का सहारा लेकर उछल-उछलकर किसी दलित लड़के से जय श्री राम कहलवाने की ज़िद कर रहा है। उसके हाथों के उछाल में मज़हब की गर्मी है, उसकी चीख़ों में मुस्तक़बिल के नादीदा वहम हैं और उसकी नसों में ख़ून की जगह आग बह रही है। एक दूसरी वीडियो अचानक उभर आयी है, उसमें यही चालीस बरस का आदमी ब्लड-प्रेशर की दवाई खा रहा है। हिन्दूराष्ट्र की तड़प ने उसे बीपी का मरीज़ बना दिया है। वो थका हुआ है, वो ये सब नहीं करना चाहता। मगर एक अनदेखी क़ुव्वत, एक उजाड़ और बेनाम लजलजी धार्मिक दुनिया का तसव्वुर उससे ये सब करवा रहा है। वो समझता है कि धर्म इसी तरह दुनिया पर राज करते हैं, बल्कि वो ख़ुद धर्म की ऐसी ही चलती-फिरती तस्वीर है। तुम इस सूरत-ए-हाल से दुखी होकर वीडियो बंद करना चाहती हो कि एक और ही वीडियो तुम्हारे आगे आख़िरी तमाशे की इल्तिजा लेकर जगमगाने लगता है। इसमें एक आदमी गेरुए रंग के कपड़े पहने, आस-पास शांति का माहौल क़ायम रखने की अपील कर रहा है। वो समझा रहा है कि धर्म का मतलब दूसरों से नफ़रत करना नहीं है। वो सभी को प्यार से देखने, इन्सानों को अपना भाई-बंधु मानने पर ज़ोर दे रहा है। आगे की बातें तुम जानती हो, इसलिए अब तुम वीडियो नहीं देखतीं। तुम उसे स्किप कर देती हो। अगला वीडियो किसी मदरसे में सर से पैर तक बुर्क़े में ढकी हुई कुछ लड़कियों का है, काले और फैले हुए बुर्क़ों में लिपटी हुई ये बच्चियाँ एक उस्तानी से तालीम हासिल कर रही हैं। वो उस्तानी उन्हें बता रही है कि इस्लाम में औरतों के क्या हुक़ूक़ हैं। सर से पैर तक एक लिबादे में लिपटी हुई, छुपी हुई लड़कियाँ जान रही हैं कि सिर्फ़ इस्लाम है, जिसने औरतों को बराबरी के हक़ दिए हैं। अल्लाह का इन्साफ़ सबसे अच्छा है और उसने किसी भी जिन्स, किसी भी शख़्स के साथ ना-इंसाफ़ी नहीं की है। तुम हैरान होकर वीडियो देखती रहती हो, फिर उसे हटाकर एक दूसरी वीडियो पर आ जाती हो। एक लड़की को हिस्टीरिया का दौरा पड़ा है, उसने अपने सारे कपड़े फाड़ लिए हैं और वो मादर-ज़ाद नंगी लड़की पूरे समाज को गंदी-गंदी गालियाँ दे रही है, फिर वो एक वार्ड-बॉय के पास जाकर उससे जिन्सी रिश्ता बनाने की दरख़्वास्त करती है, गिड़गिड़ाती है, रोती है। तुम्हें नज़र आता है कि इस लड़की की शक्ल पिछली वीडियो की उस्तानी से हू-ब-हू मिलती है। ऐसा कैसे हो सकता है। तुम पलटकर फिर वही वीडियो देखती हो और अब इस बात की तसदीक़ हो जाती है कि तुम झूठी नहीं हो। तुम्हारी आँखें झूठी नहीं हैं। उस्तानी पागल हो चुकी है या वो पहले पागल थी, तुम इस बात का फ़ैसला नहीं कर पा रही हो। तुमने थककर फ़ोन बंद कर दिया है। वैसे भी अगर दो मिनट तुम और यही वीडियो देखती रहतीं तो फ़ोन अपने आप बंद हो जाता। इसमें महज़ दो परसेंट चार्जिंग बची थी।

अब मेरा दिमाग़ थकने लगा है। वीडियोज़ तुमने देखी हैं, ख़बरें तुमने पढ़ी हैं मगर असर मुझ पर हो रहा है। दरअसल मैं तुमसे जुड़ा हुआ हूँ, उसी तरह जैसे लहर दरिया से जुड़ी होती है। मेरी जगह बदल रही है, मैं आगे की तरफ़ बढ़ रहा हूँ, तुम्हीं मुझे आगे बढ़ा रही हो। तुम्हारी बातें, तुम्हारी तहरीरें, तुम्हारी नज़्में। ये मुझे इतनी मोहलत ही नहीं देतीं कि मैं तुम्हारे शाने पर आज़ादी से सर रखकर इस दुनिया से कुछ देर के लिए बे-ख़बर हो जाऊँ। शायद तुम मुझसे उम्र में छोटी होते हुए भी मुझे दिन-ब-दिन और बड़ा करती जा रही हो। क्या तुम्हारा-मेरा ताल्लुक़ भी महज़ सियासी है? क्या मैं और तुम भी बस हिंदू और मुसलमान हैं? क्या हमारे दरमियान भी दुनिया के बाक़ी रिश्तों की भारी भीड़ मौजूद है? तुम कौन हो? मैं कौन हूँ? शायद मैं तुम्हारी मदद से रोज़ ख़ुद को भूल पाता हूँ। शायद तुम्हारी बातों के जादू में खोकर, चाहे वो कैसी ही बातें हों, उन्हें समझकर मैं तुम्हारे याक़ूती होंठों को चूमने की ख़्वाहिश में और गहरा उतर जाता हूँ। तुम्हारे पसीने में भीगे हुए माथे, सोचती हुई उदास आँखों के क़तरे और बात करते में उड़ते हुए लुआब के बारीक तरीन छींटें मेरी ज़िंदगी को मेरे होने का सही मतलब समझा रहे हैं। शायद मैं तुम्हारे क़रीब नहीं आना चाहता। तुम्हारे सीने से भी ज़्यादा गुदाज़ हैं तुम्हारी बातें, जिन्होंने मुझे चारों तरफ़ से अपने आलिंगन में कस लिया है। तुम्हारी बातों से भी ज़्यादा ठोस है तुम्हारी ख़ामोश मुस्कुराहट, जिसने मुझे अपनी आँखों के जंगल में गुम कर दिया है। शायद तुम हो, जिसका होना दुनिया के सारे झगड़ों से ज़्यादा सच्चा, सारे भेदभाव से ज़्यादा गहरा है। तुम्हारा होना अब मेरे लिए किसी पत्थर पर खुदे हुए हर्फ़ की तरह ज़िंदा है। हमेशा, हमेशा और उससे आगे भी।

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तसनीफ़ की 'ज़ुल्म के ख़िलाफ़ नज़्में' यहाँ पढ़ें
तसनीफ़
तसनीफ़ हिन्दी-उर्दू शायर व उपन्यासकार हैं। उन्होंने जामिआ मिल्लिया इस्लामिया से एम. ए. (उर्दू) किया है। साथ ही तसनीफ़ एक ब्लॉगर भी हैं। उनका एक उर्दू ब्लॉग 'अदबी दुनिया' है, जिसमें पिछले कई वर्षों से उर्दू-हिन्दी ऑडियो बुक्स पर उनके यूट्यूब चैनल 'अदबी दुनिया' के ज़रिये काम किया जा रहा है। हाल ही में उनका उपन्यास 'नया नगर' उर्दू में प्रकाशित हुआ है। तसनीफ़ से adbiduniya@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।