‘स्टापू’ – ए. के. रामानुजन्

रूपांतर: बी. आर. नारायण

यह चतुरंग
नहीं, घर की पिछली गली का
स्टापू का खेल है।

दोनों टाँगों पर सारी देह सम्भाले
एक ख़ाने से दूसरे ख़ाने में फेंकते हैं स्टापू
उसी को पाने लँगड़ी टाँग से ठोकर मार
अगले छोर पर पहुँचते हैं, क्षण भर को
दोनों टाँगें टिका सुस्ताते हैं
झट से मुड़कर लँगड़ी टाँग से
जहाँ से चले थे, ठोकर मार
वहीं आ पहुँचते हैं- मसें
भीगने से पहले। लड़के
भी सुध-बुध खोकर
यही खेल खेलते हैं- लड़कियाँ भी यही
खेल खेलती बड़ी हो जाती हैं
हमारे घर की।

गली का यही खेल
अफ्रीका में, जर्मनी में देखकर
अचरज हुआ। बम या पोलियो
आदि के शिकार न हुए हों तो
गोर, काले, पीले रंग वाले
सभी बच्चे खेलते हैं यही खेल
खेल ही ऐसा है
पड़ोस में अफ्रीका
सामने के घर में जर्मनी

बचपन में खायी सड़क की माटी में
विश्वरूप देख लेने वाले सा, क्षण भर को
हक्का-बक्का रह गया मैं।

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चित्र श्रेय: bumppy.com