कविता: ‘मैं इसलिए नहीं जा रहा हूँ’ (‘Sweetest love, I do not go’)
कवि: जॉन डन (John Donne)

भावानुवाद: दिव्या श्री

मेरी प्यारी महबूबा!
मैं इसलिए नहीं जा रहा हूँ
कि तुमसे ऊब गया हूँ
और न ही इस उम्मीद से जा रहा हूँ
कि यह दुनिया मुझे तुमसे अधिक प्यार देगी
लेकिन इसके बाद भी
एक-न-एक दिन हम सबको मरना है
फिर क्यों न मृत्यु का वरन करके देखूँ

पिछली रात्रि सूरज भी गया था
और आज यहाँ हमारे सामने है
उसके पास न तो कोई इच्छा है, न ही समझ
और उसकी यात्रा का कोई छोटा रास्ता भी तो नहीं है
फिर भी लौटता है
तो मेरे बारे में तुम डरो मत
विश्वास करो मेरी यात्रा कहीं सूर्य से अधिक तेज़ होगी

ओह! कितनी कमज़ोर है मनुष्य की शक्ति
कि अगर हमारा भाग्य हमसे रूठ जाए तो
आगे का सोच भी नहीं सकते
न ही बीते हुए अच्छे दिनों को वापस ला सकते हैं
कोई बात नहीं लेकिन बुरा वक़्त आया है तो
हम इसे अपनी ताक़त मानते हैं
और वह हमें सिखाता है
शक्ति के साथ धैर्य रखकर आगे बढ़ने की कला

जब तुम उदास होती हो
ऐसा लगता है कि मेरी आत्मा मुझसे दूर जा रही है
जब तुम रोती हो तो
मेरे जीवन में रक्त का क्षय होता है
लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए
जैसा कि तुम कहती हो, मुझसे बेहद प्यार करती हो
मेरे अच्छे दिन तो तुम्हारे पास ही हैं
तुम मुझमें सबसे अच्छी हो

कुछ भी बुरा मत सोचो
क्योंकि भाग्य अपना खेल खेल सकता है
और तुम्हारा डर पूरा हो सकता है
तुम बस सोचो कि
बिस्तर के एक तरफ़ तुम और एक तरफ़ मैं सोया हूँ
वैसे भी जो लोग दिल में रहते हैं
वे कभी भी अलग नहीं होंगे
क्योंकि प्रेम अलौकिक है।

जॉन डन की कविता 'मृत्यु, इतना घमण्ड मत करो तुम'

किताब सुझाव:

दिव्या श्री
मैं दिव्या श्री, कला संकाय में स्नातक कर रही हूं। कविताएं लिखती हूं। अंग्रेजी साहित्य मेरा विषय है तो अनुवाद में भी रुचि रखती हूं। बेगूसराय बिहार में रहती हूं। प्रकाशन: हंस, वागर्थ, ककसाड़, कविकुम्भ, उदिता, जानकीपुल, शब्दांकन, इंद्रधनुष , पोषम पा, कारवां, साहित्यिक, तीखर, हिन्दीनामा, अविसद, ईमेल आईडी: divyasri.sri12@gmail.com