तारीखों का सफर

तुम्हें सोचकर
आँखों में जो मौसम उतरता है
उसे सिर्फ़ ‘आई मिस यू’ बुदबुदाकर टाला नहीं जा सकता
उसके लिए
चलना पड़ता है पीछे की तरफ़
गिननी पड़ती है हर गिनती, उल्टी
पलटने पड़ते हैं पिछले एक सौ बीस पन्ने कैलेण्डर के
तब दिखता है वो पहला ‘हेलो’
और उसकी उँगली थामे, फिर करना होता है सारा का सारा सफ़र
चलना तब तक जब तक आँखें कुछ हफ़्तों बरसती न रहें
और यूँ ही ठहर जाना अचानक एक सुबह,
फिर नया काजल लगाए निकलना, कि-

‘मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तिरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे!’