नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘झेलम’ – आशीष मनचंदा

प्रेम, भरोसा, समर्पण.. ये सारे शब्द एक ऐसी गुत्थी में उलझे रहते हैं कि किसी एक की डोर खिंचे तो तनाव दूसरों में भी पैदा होता है। बिना प्रेम भरोसा नहीं, बिना भरोसे समर्पण नहीं। Read more…

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कविता | Poetry

प्रेम की एक कविता ताल्लुक़ के कई सालों का दस्तावेज़ है

त्याग, समर्पण और यहाँ तक कि अनकंडीशनल लव भी प्रेम में पुरानी बातें हैं। और पुरानी इसलिए क्योंकि जब भी किसी ने इन शब्दों को इनके शाब्दिक अर्थों में ही साधना चाहा, हमेशा प्रेम हारा Read more…

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नव-लेखन | New Writing

बनारस का कोई मजाकिया ब्राह्मण लगता हूँ – आदर्श भूषण

आज कुछ सत्य कहता हूँ, ईर्ष्या होती है थोड़ी बहुत, थोड़ी नहीं, बहुत। लोग मित्रों के साथ, झुंडों में या युगल, चित्रों से, मुखपत्र सजा रहें हैं.. ऐसा मेरा कोई मित्र नहीं। कुछ महिला मित्रों Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता जंगलों में गश्त लगाता हुआ चौकीदार है..

जीवन में कविता का उद्देश्य सदियों से ढूँढा जाता रहा है, और कविता में जीवन का अस्तित्व भी। कभी कोई कविता यह कहकर खारिज कर दी गयी कि उसने मानवीय अनुभूतियों को अपने अंदर नहीं Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘इस बार बसन्त के आते ही’ – पुनीत कुसुम

इस बार बसन्त के आते ही मैं पेड़ बनूँगा एक बूढ़ा और पुरवा के कान में फिर जाकर धीरे से बोलूँगा- “शरद ने देखो इस बारी अच्छे से अपना काम किया जर्जर सूखे जो पत्ते Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

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नव-लेखन | New Writing

“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

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अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

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नव-लेखन | New Writing

कविता: ‘खजूर बेचता हूँ’ – पुनीत कुसुम

न सीने पर हैं तमगे न हाथों में कलम है न कंठ में है वीणा न थिरकते कदम हैं इस शहर को छोड़कर जिसमें घर है मेरा उस ग़ैर मुल्क जाके लोगों के मुँह देखता Read more…

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पुस्तक समीक्षा | Book Reviews

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

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कविता | Poetry

‘कविता’ पर कविताएँ

जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। Read more…

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कविता | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

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