कविता | Poetry

कविता: मैं समर अवशेष हूँ – पूजा शाह

‘कुरुक्षेत्र’ कविता और ‘अँधा युग’ व् ‘ताम्बे के कीड़े’ जैसे नाटक जिस बात को अलग-अलग शैलियों और शब्दों में दोहराते हैं, वहीं एक दोस्त की यह कविता भी उन लोगों का मुँह ताकती है जो Read more…

By Posham Pa, ago
कविता | Poetry

कविता: ‘तमाशा’ – पुनीत कुसुम

उन्मादकता की शुरुआत हो जैसे जैसे खुलते और बंद दरवाज़ों में खुद को गले लगाना हो जैसे कोनों में दबा बैठा भय आकर तुम्हारे हौसलों का माथा चूम जाए जैसे वो सत्य जिसे झुठलाने की Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

“शदायी केह्न्दे ने” – रमेश पठानिया की कविताएँ

आधुनिक युग का आदमियत पर जो सबसे बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है वो है इंसान से उसकी सहजता छीन लेना। थोपे हुए व्यवसाए हों या आगे बढ़ जाने की दौड़, हम जाने किन-किन माध्यमों का प्रयोग Read more…

By Puneet Kusum, ago
अनुवाद | Translation

कविता: ‘स्वयं हेतु’ – रिया जैन

रिया अंग्रेज़ी कविताएँ लिखती हैं और अपनी उम्र की भावनाएँ और असमंजस बड़े सुलझे हुए शब्दों में उकेरती हैं। मैंने यह कविता रिया के ब्लॉग The Scribbling Girl पर पढ़ी थी और चूंकि हिन्दी में ज़्यादा Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

कविता: ‘कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ’ – पुनीत कुसुम

तुम कहती हो “कहते हो.. प्यार करते हो.. तो मान लेती हूँ” मगर, क्यों मान लेती हो? आख़िर, क्यों मान लेती हो? पृथ्वी तो नहीं मानती अपने गुरुत्व को जब तक कोई ज़मीन से अपनी Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

खजूर बेचता हूँ – पुनीत कुसुम

न सीने पर हैं तमगे न हाथों में कलम है न कंठ में है वीणा न थिरकते कदम हैं इस शहर को छोड़कर जिसमें घर है मेरा उस ग़ैर मुल्क जाके लोगों के मुँह देखता Read more…

By Puneet Kusum, ago
किताबें | Books

एक अतिरिक्त ‘अ’ – रश्मि भारद्वाज

भारतीय ज्ञानपीठ के जोरबाग़ वाले बुकस्टोर में एक किताब खरीदने गया था। खुले पैसे नहीं थे तो बिलिंग पर बैठे सज्जन ने सुझाया कि कोई और किताब भी देख लीजिए। यद्यपि मैं ऐसे बहाने ढूँढा Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

‘कविता’ पर कविताएँ

जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का जूता, मोजा, दस्ताने, स्वेटर और कोट

आप सोच रहे होंगें कि मैं सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कपड़ों की अलमारी क्यों खोलकर बैठा हूँ। लेकिन आप ग़लत सोच रहे हैं। ये सब चीज़ें उनकी कपड़ों की अलमारी से नहीं, उनके कविता संग्रह ‘खूटियों पर Read more…

By Puneet Kusum, ago

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