आलस्य-भक्त

'आलस्य-भक्त' - बाबू गुलाब राय अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।…

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भोलाराम का जीव

'भोलाराम का जीव' - हरिशंकर परसाई ऐसा कभी नहीं हुआ था। धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश…

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एक था राजा

व्यंग्य: 'एक था राजा' - सुशील सिद्धार्थ यह एक सरल, निष्कपट, पारदर्शी और दयालु समय की कहानी है। एक दिन…

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निंदा रस

'निंदा रस' - हरिशंकर परसाई ‘क’ कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे…

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