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किताब

पलटती हूँ कभी जब सफ़हे क़िताब के हर्फ़ दर हर्फ़ खुलती जाती है कायनात और मैं खो जाती हूँ रोज़ शब होता है उजाला मेरी क़िताब के माहताब से अल्फ़ाज़ बना देते है नींद का बिछौना और...
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