Tag: Absurd Natak

Bhuvaneshwar

ताँबे के कीड़े

"बादलों ने सूरज की हत्या कर दी, सूरज मर गया। मैं दूसरे का बोझ ढोता हूँ। मेरे रिक्शे में आईने लगे हैं। आईने में मैं अपना मुँह देखता हूँ। सूरज नहीं रहा। अब धरती पर आईनों का शासन होगा। आईने अब उगने और न उगने वाले बीज अलग-अलग कर देंगे।" न कोई कथा, न मंच विधान, केवल एक काला परदा और एक झुनझुना लिए हुए अनाउंसर स्त्री! अजीब सा रुका-रुका सा नाटक, किन्तु समझ लिया जाए तो अर्थ और प्रभाव से कोई अछूता नहीं रह सकता। यह नाटक आदमी को मशीन न बनने देने के लिए संघर्ष करता है और यह बताता है कि भय और मृत्यु का प्रतिरोध करने का सबसे सशक्त ढंग है- जीवन को जीने लायक बनाना! ज़रूर पढ़िए!
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