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सच यही है
'Sach Yahi Hai', a poem by Mohandas Naimishrai
सच यही है
मंदिर में आरती गाते हुए भी
नज़दीक की
मस्जिद तोड़ने की लालसा
हमारे भीतर जागती रहती है
और मस्जिद में...
92 से पहले
"खाने की तलाश में घूमते-घूमते झबरू एक घर के सामने पहुँचा जो कुछ अजीब सा था। एक तो वो घर बहुत खुली जगह में बना था और उस घर में कोई दरवाज़ा भी नहीं था। जिसकी मर्ज़ी होती वो उस घर जा सकता था। एक और अजीब बात झबरू ने देखी, वो ये कि इस घर में लोग हाथ जोड़ के आ रहे थे। वो अपने साथ ढेर सारी खाने-पीने की चीज़ें लाते और घर के अंदर छोड़ के चले जाते। इंसानों का ये रूप झबरू के लिए बिल्कुल नया था।"

