ग़ज़ल | Ghazal

ग़ज़ल: सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ – बहादुर शाह ज़फ़र

सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ सूफ़ियों में हूँ न रिन्‍दों में, न मयख़्वारों में हूँ, ऐ बुतो, बन्‍दा ख़ुदा का हूँ, गुनहगारों में हूँ! मेरी मिल्‍लत है मुहब्‍बत, मेरा मज़हब Read more…

By Posham Pa, ago
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ग़ज़ल: ‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र

‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं जो यह कहते हैं सुना है, पर ख़ुदा देखा नहीं ख़ौफ़ है रोज़े-क़यामत का Read more…

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