पुस्तक समीक्षा | Book Reviews

‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ – नरेन्द्र कोहली

‘पांच एब्सर्ड उपन्यास’ – नरेन्द्र कोहली नरेन्द्र कोहली की किताब ‘पाँच एब्सर्ड उपन्यास’ पर आदित्य भूषण मिश्रा की टिप्पणी! मैंने जब किताब के ऊपर यह नाम देखा तो कुछ ठीक-ठीक समझ नहीं पाया. किताब उलटते-पुलटते Read more…

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नरेन्द्र कोहली की ‘क्षमा करना जीजी’

‘क्षमा करना जीजी’ – नरेन्द्र कोहली आज सुबह “क्षमा करना जीजी” पढ़ना शुरू किया. यह नरेन्द्र कोहली लिखित सामाजिक उपन्यास है. यह अपने आप में कुछ अधिक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि सामान्यतः नरेन्द्र Read more…

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‘पाकिस्तान का मतलब क्या’ – एक टिप्पणी

‘पाकिस्तान का मतलब क्या’ – एक टिप्पणी असग़र वजाहत की किताब ‘पाकिस्तान का मतलब क्या’ पर आदित्य भूषण मिश्रा की एक टिप्पणी मैं अभी पिछले दिनों, असग़र वजाहत साब की क़िताब “पाकिस्तान का मतलब क्या” Read more…

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‘आधे-अधूरे’: अपूर्ण महत्त्वाकांक्षाओं की कलह

मोहन राकेश का नाटक ‘आधे-अधूरे’ एक मध्यमवर्गीय परिवार की आंतरिक कलह और उलझते रिश्तों के साथ-साथ समाज में स्त्री-पुरुष के बीच बदलते परिवेश तथा एक-दूसरे से दोनों की अपेक्षाओं को चित्रित करता है। महेन्द्रनाथ बहुत Read more…

By Puneet Kusum, ago
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‘हीरा फेरी’ – सुरेन्द्र मोहन पाठक का इकसठ माल

जितना बड़ा नाम सुरेन्द्र मोहन पाठक हिन्दी के अपराध लेखन या पोपुलर साहित्य में रखते हैं, उस हिसाब से आज भी मुझे लगता है कि उन्हें कम पढ़ा गया है। मेरी इस बात को पाठक Read more…

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The Night Train at Deoli – Ruskin Bond

बहुत अच्छे लेखकों के बारे में यह एक आम धारणा है कि उन्हें उनकी मूल भाषा में ही पढ़ा जाना चाहिए। रस्किन बॉन्ड, जिन्होंने मूलतः अंग्रेजी में लिखा है, उनके बारे में भी यही कहा Read more…

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जगदीश चंद्र की ‘धरती धन न अपना’

जगदीश चंद्र की किताब ‘धरती धन न अपना’ एक और किताब है जो मुझे बड़ी मशक्कतों के बाद केवल ऑनलाइन एक सॉफ्टकॉपी के रूप में मिल पायी, जबकि यह किताब अपने विषय की एक उम्दा Read more…

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‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ – अनुराधा बेनीवाल

अनुराधा बेनीवाल की यह पहली किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’, राजकमल प्रकाशन की ‘यायावरी आवारगी’ शृंखला का पहला पड़ाव है। वैसे तो शृंखला के नाम से जाहिर है कि यह एक यात्रा-वृत्तांत (travelogue) है, लेकिन किताब Read more…

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नई हिन्दी की शोस्टॉपर – रवीश कुमार की ‘इश्क़ में शहर होना’

मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ… और मैं मेट्रो-सी। पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी Read more…

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