लप्रेक | Laprek

लप्रेक – इश्क़ में ‘आम’ होना

“तुम ऐसे खाते हो? मैं तो काट के खाती हूँ। ऐसे गँवार लगते हैं और मुँह भी गन्दा हो जाता है और पब्लिक में तो ऐसे खा ही नहीं सकते। तुम न जाने कैसे…। अच्छा Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – मन की बात

“सुनो।” “हाँ।” “अगर मेरे लिए कोई मन्दिर बनाकर उसमें मेरी मूर्ति रखे, तो मुझे तो बहुत अच्छा लगे।” “पर ऐसे पूजने वाले ज्यादा हो जायेंगे और प्यार करने वाले कम।” “प्यार करने वाले चाहिए भी Read more…

By Puneet Kusum, ago
लप्रेक | Laprek

लप्रेक – तुम मुबारक

“लगे इलज़ाम लाखो हैं कि घर से दूर निकला हूँ तुम्हारी ईद तुम समझो, मैं तो बदस्तूर निकला हूँ।” “तुम नहीं सुधरोगे ना? कोई घर ना जा पाने से दुखी है और तुम्हें व्यंग सूझ Read more…

By Puneet Kusum, ago
कविता | Poetry

एक्सट्रा चीज़! – शिवा & पुनीत कुसुम

Shiva- कभी आँखों से लिख दो कुछ मेरी आखों पर कि हया की हर झुकी नज़र का गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो और दुआ में उठी पलकें वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें Puneet- तुम आँखों Read more…

By Shiva, ago

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