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पंच-अतत्व

'Panchatatva', a poem by Mudit Shrivastava 'मैं ताउम्र जलती रही दूसरों के लिए, अब मुझमें ज़रा भी आग बाक़ी नहीं' आग ने यह कहकर जलने से इंकार कर दिया 'मैं बाहर...

अचेतन

अक्सर बैठे घिसती रहती हूँ चेतना लोगों की कि कहीं किसी कोने में छिपा सम्वेदना का जिन्न मुझसे आकर पूछे- "क्या हुक्म मेरे आक़ा?" और मैं झट से उसे पांडोरा के...
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