व्यंग्य | Satire

व्यंग्य: ‘भोलाराम का जीव’ – हरिशंकर परसाई

‘भोलाराम का जीव’ – हरिशंकर परसाई ऐसा कभी नहीं हुआ था। धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलॉट करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी Read more…

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व्यंग्य | Satire

व्यंग्य: ‘निंदा रस’ – हरिशंकर परसाई

‘निंदा रस’ – हरिशंकर परसाई ‘क’ कई महीने बाद आए थे। सुबह चाय पीकर अखबार देख रहा था कि वे तूफ़ान की तरह कमरे में घुसे, ‘साइक्लोन’ की तरह मुझे अपनी भुजाओं में जकड़ा तो Read more…

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उद्धरण | Quotes

कुछ पंक्तियाँ – ‘अपनी अपनी बीमारी’ (हरिशंकर परसाई)

“जो नहीं है, उसे खोज लेना शोधकर्ता का काम है। काम जिस तरह होना चाहिए, उस तरह न होने देना विशेषज्ञ का काम है। जिस बीमारी से आदमी मर रहा है, उससे उसे न मरने Read more…

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व्यंग्य | Satire

परसाई के हनुमान: प्रथम साम्यवादी या प्रथम स्मगलर?

हरिशंकर परसाई सदियों पुराने मिथकों में अपनी कल्पना जोड़कर उसे आज के समाज की विसंगतियों का रूप दे देने के लिए जाने जाते हैं, चाहे वो कृष्ण-सुदामा मिलन का प्रसंग हो या फिर त्रिशंकु की Read more…

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